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गणेश उत्सव में घर-घर गणपति बप्पा की मूर्ति की स्थापना होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश जी की प्रतिमा के लिए मिट्टी को इतना विशेष महत्व क्यों दिया गया है ? आखिर मिट्टी की प्रतिमा में ऐसा क्या है, जो हमारी धार्मिक परंपरा और प्रकृति-दोनों से जुड़ जाता है ? दरअसल, सनातन परंपरा में मिट्टी को केवल एक प्राकृतिक संसाधन ही नहीं बल्कि पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना गया है। ये पृथ्वी पर जीवन की नींव है जिसमें वायु और जल भी शामिल है । ठीक उसी प्रकार जैसे हमारा शरीर भी पंचतत्वों से बना है और अंततः इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है।
भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमा हमें इसी सत्य का स्मरण कराती है कि जिस धरती से जीवन मिला है, उसी धरती के प्रति सम्मान भी हमारा धर्म है। शिवमहापुराण के अनुसार माता पार्वती ने स्नान के समय अपने शरीर के उबटन से मिट्टी पर गणेश जी की आकृति बनाई और उसमें प्राणों का संचार किया। इसी कथा से गणेश जी के मिट्टी से जुड़े स्वरूप का एक गहरा सांकेतिक अर्थ सामने आता है - मिट्टी के माध्यम से सृजन और फिर उसी प्रकृति में विलय। गणेश प्रतिमा की स्थापना के बाद उसके विसर्जन की परंपरा भी इसी संदेश को आगे बढ़ाती है। अर्थात कुछ समय के लिए हम भगवान के साकार स्वरूप की पूजा करते हैं, और फिर प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। इसका भाव है- संसार में जो आया है, उसका एक दिन प्रकृति में विलय होना निश्चित है। यानी गणेश जी की प्रतिमा केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि सृजन, जीवन, परिवर्तन और प्रकृति में लौटने का संदेश भी देती है।

