अनंत चतुर्दशी पर ही क्यों होता है गणेश मूर्ति विसर्जन ?
इस बार भी अनंत चतुर्दशी के अवसर पर गणपति बप्पा को भक्तों ने श्रद्धा के साथ विदाई दी। ढोल-नगाड़ों, कीर्तन और गणपति बप्पा के जयकारों के बीच भक्तों ने अपने आराध्य को भावुक मन से विदा किया। लेकिन हर बार जैसे ही गणेश उत्सव अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है, एक सवाल भी मन में आता है कि आखिर गणेश जी का विसर्जन अनंत चतुर्दशी (चौदस) के दिन ही क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे सिर्फ एक धार्मिक परंपरा है, या फिर इसके पीछे छिपी है कोई पौराणिक कथा, आध्यात्मिक मान्यता और गहरा संदेश? आइए जानतें है कि अनंत चतुर्दशी और गणपति विसर्जन का रिश्ता आखिर इतना खास क्यों है।
गणेश चतुर्थी के दिन घरों और पंडालों में गणपति बप्पा की स्थापना होती है। कहीं मिट्टी से बनी छोटी-सी प्रतिमा विराजती है, तो कहीं विशाल प्रतिमा के साथ भव्य पंडाल सजाए जाते हैं। कई दिनों तक पूजा, आरती, भजन और उत्सव का सिलसिला चलता है। लेकिन इस उत्सव का सबसे भावुक पड़ाव होता है गणेश विसर्जन।
कई परिवार और परंपराएं गणेश प्रतिमा का विसर्जन गणेश चतुर्थी के बाद अलग-अलग दिनों में करते हैं। कहीं डेढ़ दिन बाद विसर्जन होता है... कहीं तीसरे दिन... कहीं पांचवें या सातवें दिन... और कहीं गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक अलग-अलग परंपराओं के अनुसार विसर्जन किया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र समेत कई क्षेत्रों में अनंत चतुर्दशी को गणेश उत्सव के भव्य समापन और सामूहिक विसर्जन के दिन के रूप में विशेष महत्व मिला है।
जिस गणपति को भक्त इतने प्रेम और श्रद्धा से अपने घर लाते हैं, उसी गणपति को विदाई देते वक्त आंखें नम हो जाती हैं और इस विदाई के लिए चुना जाता है, अनंत चतुर्दशी का दिन। लेकिन सवाल है... अनंत चतुर्दशी ही क्यों? दरअसल, गणेश विसर्जन की परंपरा को समझने के लिए हमें सिर्फ गणेश चतुर्थी तक नहीं, बल्कि अनंत चतुर्दशी के धार्मिक महत्व को समझना होगा। अनंत चतुर्दशी हिंदू पंचांग की भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। अनंत चतुर्दशी नाम में ही इसका अर्थ छिपा है। अनंत यानी जिसका अंत नहीं। और गणपति तो आदि अनादि काल से ही अपनी कृपा हम सभी पर बरसा रहे हैं।
गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है... पूजा की जाती है... और फिर उसी प्रतिमा का जल में विसर्जन कर दिया जाता है। पहली नजर में ये एक विदाई लगती है। लेकिन आध्यात्मिक अर्थ में ये विदाई से ज्यादा एक वापसी है। मिट्टी से बनी प्रतिमा... प्रकृति से आती है और अंत में प्रकृति में ही विलीन हो जाती है। यानी जन्म, अस्तित्व और फिर प्रकृति में विलय। ये हमें याद दिलाता है कि रूप बदलता है, लेकिन तत्व समाप्त नहीं होता। इसीलिए विसर्जन को गणपति के अंत के रूप में नहीं, बल्कि उनके अपने मूल तत्व में लौटने के रूप में देखा जाता है।
गणेश विसर्जन से जुड़ी एक और बेहद लोकप्रिय धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने भगवान गणेश को महाभारत लिखने के लिए कहा था। गणेश जी लगातार महाभारत का लेखन करते रहे। और इस कथा के अनुसार, लंबे समय तक लगातार लेखन करने के बाद जब लेखन कार्य पूरा हुआ, तब गणेश जी के शरीर का तापमान बढ़ गया था। वेद व्यास ने उन्हें ठंडक देने के लिए मिट्टी का लेप किया और इसी प्रसंग से गणेश प्रतिमा के मिट्टी से बनने और फिर जल में विसर्जन को देखकर जोड़ा जाता है। हालांकि, अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इस कथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं।
अनंत चतुर्दशी पर ही क्यों होता है गणेश मूर्ति विसर्जन ?
इस बार भी अनंत चतुर्दशी के अवसर पर गणपति बप्पा को भक्तों ने श्रद्धा के साथ विदाई दी। ढोल-नगाड़ों, कीर्तन और गणपति बप्पा के जयकारों के बीच भक्तों ने अपने आराध्य को भावुक मन से विदा किया। लेकिन हर बार जैसे ही गणेश उत्सव अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है, एक सवाल भी मन में आता है कि आखिर गणेश जी का विसर्जन अनंत चतुर्दशी (चौदस) के दिन ही क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे सिर्फ एक धार्मिक परंपरा है, या फिर इसके पीछे छिपी है कोई पौराणिक कथा, आध्यात्मिक मान्यता और गहरा संदेश? आइए जानतें है कि अनंत चतुर्दशी और गणपति विसर्जन का रिश्ता आखिर इतना खास क्यों है।
गणेश चतुर्थी के दिन घरों और पंडालों में गणपति बप्पा की स्थापना होती है। कहीं मिट्टी से बनी छोटी-सी प्रतिमा विराजती है, तो कहीं विशाल प्रतिमा के साथ भव्य पंडाल सजाए जाते हैं। कई दिनों तक पूजा, आरती, भजन और उत्सव का सिलसिला चलता है। लेकिन इस उत्सव का सबसे भावुक पड़ाव होता है गणेश विसर्जन।
कई परिवार और परंपराएं गणेश प्रतिमा का विसर्जन गणेश चतुर्थी के बाद अलग-अलग दिनों में करते हैं। कहीं डेढ़ दिन बाद विसर्जन होता है... कहीं तीसरे दिन... कहीं पांचवें या सातवें दिन... और कहीं गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक अलग-अलग परंपराओं के अनुसार विसर्जन किया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र समेत कई क्षेत्रों में अनंत चतुर्दशी को गणेश उत्सव के भव्य समापन और सामूहिक विसर्जन के दिन के रूप में विशेष महत्व मिला है।
जिस गणपति को भक्त इतने प्रेम और श्रद्धा से अपने घर लाते हैं, उसी गणपति को विदाई देते वक्त आंखें नम हो जाती हैं और इस विदाई के लिए चुना जाता है, अनंत चतुर्दशी का दिन। लेकिन सवाल है... अनंत चतुर्दशी ही क्यों? दरअसल, गणेश विसर्जन की परंपरा को समझने के लिए हमें सिर्फ गणेश चतुर्थी तक नहीं, बल्कि अनंत चतुर्दशी के धार्मिक महत्व को समझना होगा। अनंत चतुर्दशी हिंदू पंचांग की भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। अनंत चतुर्दशी नाम में ही इसका अर्थ छिपा है। अनंत यानी जिसका अंत नहीं। और गणपति तो आदि अनादि काल से ही अपनी कृपा हम सभी पर बरसा रहे हैं।
गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है... पूजा की जाती है... और फिर उसी प्रतिमा का जल में विसर्जन कर दिया जाता है। पहली नजर में ये एक विदाई लगती है। लेकिन आध्यात्मिक अर्थ में ये विदाई से ज्यादा एक वापसी है। मिट्टी से बनी प्रतिमा... प्रकृति से आती है और अंत में प्रकृति में ही विलीन हो जाती है। यानी जन्म, अस्तित्व और फिर प्रकृति में विलय। ये हमें याद दिलाता है कि रूप बदलता है, लेकिन तत्व समाप्त नहीं होता। इसीलिए विसर्जन को गणपति के अंत के रूप में नहीं, बल्कि उनके अपने मूल तत्व में लौटने के रूप में देखा जाता है।
गणेश विसर्जन से जुड़ी एक और बेहद लोकप्रिय धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने भगवान गणेश को महाभारत लिखने के लिए कहा था। गणेश जी लगातार महाभारत का लेखन करते रहे। और इस कथा के अनुसार, लंबे समय तक लगातार लेखन करने के बाद जब लेखन कार्य पूरा हुआ, तब गणेश जी के शरीर का तापमान बढ़ गया था। वेद व्यास ने उन्हें ठंडक देने के लिए मिट्टी का लेप किया और इसी प्रसंग से गणेश प्रतिमा के मिट्टी से बनने और फिर जल में विसर्जन को देखकर जोड़ा जाता है। हालांकि, अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इस कथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं।