जिस मस्तक में बुद्धि का प्रकाश है, वही प्रथम पूज्य गणेश कहलाते हैं... जिसके नाम मात्र से विघ्नों का नाश और मंगल का आगमन होता है... लेकिन क्या आप जानते हैं, एक ऐसी रहस्यमयी गुफा है, जहां के बारे में मान्यता है कि भगवान गणेश का मूल मस्तक आज भी अवस्थित है।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है पाताल भुवनेश्वर... धरती की सतह से करीब 90 फीट नीचे बनी चूना-पत्थर की प्राकृतिक गुफा, आस्था और रहस्य का ऐसा संसार है, जहां हर शिला अपने भीतर एक कथा समेटे हुए है। स्कंदपुराण के मानसखंड में वर्णित मान्यताओं के अनुसार, पाताल भुवनेश्वर में स्वयं भगवान शिव, गणेशजी सहित विराजमान हैं, और देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं। कहा जाता है कि त्रेतायुग में सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में पहुंचे... और यहां उन्हें भगवान शिव समेत 33 कोटि देवी-देवताओं के दर्शन हुए। लेकिन इस गुफा का सबसे बड़ा रहस्य जुड़ा है प्रथम पूज्य गणपति से।
मान्यता है कि माता पार्वती के आदेश पर द्वार की रक्षा कर रहे बाल गणेश का जब भगवान शिव के कोप से सामना हुआ तो उन्होंने गणेश जी का शीश धड़ से अलग कर दिया। मान्यतानुसार विनायक का वही मूल शीश पाताल भुवनेश्वर की इस पवित्र गुफा में स्वयं महादेव ने रखा था जो आज भी सुरक्षित है। गुफा के भीतर वही शीश आज वर्तमान में एक शिला का रूप ले चुका है जिनको आदि गणेश का कटा हुआ मस्तक माना जाता है, जिसका दर्शन पूजन करने श्रद्धालु आज भी यहां आते हैं। यानी ये सिर्फ एक गुफा नहीं... बल्कि ऐसी जगह मानी जाती है, जहां गणेश जी के प्राकट्य की कथा का एक अद्भुत अध्याय आज भी पत्थरों में जीवंत दिखाई देता है।
संकरे और बेहद चिकने रास्तों से होकर जब श्रद्धालु इस गुफा में उतरते हैं, तो लोहे की जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है। कहीं शेषनाग के आकार की शिला दिखाई देती है, तो कहीं ब्रह्मा जी के हंस की आकृति। गुफा में एक हवन कुंड भी है जिसके बारे में मान्यता है कि राजा जनमेजय ने यहां नाग यज्ञ किया था। वाकई धन्य है सनातन धर्म और अद्भुत है गौरी पुत्र गणेश की लीला।
जिस मस्तक में बुद्धि का प्रकाश है, वही प्रथम पूज्य गणेश कहलाते हैं... जिसके नाम मात्र से विघ्नों का नाश और मंगल का आगमन होता है... लेकिन क्या आप जानते हैं, एक ऐसी रहस्यमयी गुफा है, जहां के बारे में मान्यता है कि भगवान गणेश का मूल मस्तक आज भी अवस्थित है।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है पाताल भुवनेश्वर... धरती की सतह से करीब 90 फीट नीचे बनी चूना-पत्थर की प्राकृतिक गुफा, आस्था और रहस्य का ऐसा संसार है, जहां हर शिला अपने भीतर एक कथा समेटे हुए है। स्कंदपुराण के मानसखंड में वर्णित मान्यताओं के अनुसार, पाताल भुवनेश्वर में स्वयं भगवान शिव, गणेशजी सहित विराजमान हैं, और देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं। कहा जाता है कि त्रेतायुग में सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में पहुंचे... और यहां उन्हें भगवान शिव समेत 33 कोटि देवी-देवताओं के दर्शन हुए। लेकिन इस गुफा का सबसे बड़ा रहस्य जुड़ा है प्रथम पूज्य गणपति से।
मान्यता है कि माता पार्वती के आदेश पर द्वार की रक्षा कर रहे बाल गणेश का जब भगवान शिव के कोप से सामना हुआ तो उन्होंने गणेश जी का शीश धड़ से अलग कर दिया। मान्यतानुसार विनायक का वही मूल शीश पाताल भुवनेश्वर की इस पवित्र गुफा में स्वयं महादेव ने रखा था जो आज भी सुरक्षित है। गुफा के भीतर वही शीश आज वर्तमान में एक शिला का रूप ले चुका है जिनको आदि गणेश का कटा हुआ मस्तक माना जाता है, जिसका दर्शन पूजन करने श्रद्धालु आज भी यहां आते हैं। यानी ये सिर्फ एक गुफा नहीं... बल्कि ऐसी जगह मानी जाती है, जहां गणेश जी के प्राकट्य की कथा का एक अद्भुत अध्याय आज भी पत्थरों में जीवंत दिखाई देता है।
संकरे और बेहद चिकने रास्तों से होकर जब श्रद्धालु इस गुफा में उतरते हैं, तो लोहे की जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है। कहीं शेषनाग के आकार की शिला दिखाई देती है, तो कहीं ब्रह्मा जी के हंस की आकृति। गुफा में एक हवन कुंड भी है जिसके बारे में मान्यता है कि राजा जनमेजय ने यहां नाग यज्ञ किया था। वाकई धन्य है सनातन धर्म और अद्भुत है गौरी पुत्र गणेश की लीला।