14 Views
सालभर में आने वाली पूर्णिमाओं में शरद पूर्णिमा का विशेष स्थान है। शरद ऋतु की चांदनी और सुहावनी रात में जब चंद्रमा अपनी पूरी चमक के साथ आकाश में दिखाई देता है, तो उसकी आभा मन को एक अलग ही सुकून देती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात को बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है। यही कारण है कि इस रात खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसके साथ ही मां लक्ष्मी की पूजा और रात्रि जागरण का भी विशेष महत्व है। आइए जानते हैं कि शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है और इस दिन चांद की रौशनी में खीर रखने के पीछे क्या मान्यता है।
शरद पूर्णिमा पर क्यों खास होता है चंद्रमा ?
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ दिखाई देता है। चंद्रमा की शीतल रोशनी को मन की शांति, सकारात्मकता और सौम्यता से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा और रात्रि जागरण करने की परंपरा भी है। इस बार 25 अक्टूबर (रविवार) को आ रहे इस दिव्य पर्व के बारे में मान्यता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी रात्रि में भ्रमण करती हैं और जागकर आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। इस दिन चांद धरती के सबसे करीब होता है। रोशनी सबसे ज्यादा होने के कारण इनका असर भी अधिक होता है। रोशनी अधिक होने पर भी तीव्रता या तीक्ष्णता नहीं होती। इसलिए आपकी आंखों पर उसका कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।
खीर ही क्यों ?
पौराणिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा से अमृत बरसता है। इसी विश्वास के चलते लोग रात में खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं और सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक आधार यह है कि दूध और चावल से बनी खीर को रातभर खुले आसमान के नीचे रखने से चंद्रमा की शीतल और सकारात्मक किरणें उस पर पड़ती हैं, जिससे स्वास्थ्य लाभ होता है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। शरद ऋतु की शुरुआत में मौसम बदलने से शरीर का पित्त (गर्मी) और वात प्रभावित होते हैं। दूध और चावल की शीतल खीर शरीर की गर्मी को शांत करती है। दूध में लैक्टिक एसिड होता है और चावल में स्टार्च होता है, जो चांदनी के संपर्क में आकर इसके पोषण गुणों को बढ़ाते हैं। इसे अगले दिन सुबह माता लक्ष्मी अथवा अपने आराध्य देव को अर्पित करके परिवार सहित प्रसाद के रूप में खाने की परंपरा है। इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य भी दिया जाता है ।
क्या हैं चंद्रमा की 16 कलाएं ?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में चंद्रमा की 16 कलाओं में निपुणता को उसकी पूर्णता और विभिन्न दैवीय गुणों का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी सभी कलाओं से युक्त होता है। इन कलाओं को सौंदर्य, शांति, समृद्धि, प्रेम, ज्ञान और आनंद जैसे गुणों से जोड़कर देखा जाता है। एक प्रचलित धार्मिक सूची के अनुसार, चंद्रमा की 16 कलाएं और उनके अर्थ इस प्रकार बताए जाते हैं:
1. अमृता : अमरत्व और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक
2. मनदा : मन और विचारों से संबंधित कला
3. पुष्प : सौंदर्य और कोमलता का प्रतीक
4. पुष्टि : पोषण, स्वास्थ्य और समृद्धि का भाव
5. तुष्टि: संतोष और इच्छापूर्ति का प्रतीक
6. धृति : धैर्य, स्थिरता और दृढ़ता
7. शशिनी : चंद्रमा की शीतलता और आभा
8. चंद्रिका : शांति और चांदनी का प्रतीक
9. कांति : तेज, आकर्षण और आभा
10. ज्योत्स्ना : चंद्रमा का प्रकाश
11. श्री : धन, वैभव और सौभाग्य
12. प्रीति : प्रेम, स्नेह और अपनत्व
13. अंगदा : शक्ति और स्थायित्व का भाव
14. धरा : धारण करने और पोषण देने की शक्ति
15. पूर्णा : पूर्णता और संतुलन का प्रतीक
16. पूर्णामृत : आनंद, तृप्ति और दिव्य सुख का भाव।
शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा का महत्व
शरद पूर्णिमा को मां लक्ष्मी की आराधना के लिए भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी उपासना करने वाले भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। इसी वजह से इसे कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। 'कोजागरी' शब्द का अर्थ है—कौन जाग रहा है ?
इस दिन भक्त घर की साफ-सफाई करते हैं, दीपक जलाते हैं और मां लक्ष्मी को फूल, फल, मिठाई तथा खीर का भोग लगाते हैं। कई स्थानों पर रात में जागरण करने की परंपरा भी है। भक्त प्रार्थना करते हैं कि उनके घर में सुख-शांति बनी रहे और जीवन में आर्थिक समृद्धि आए।
शरद पूर्णिमा से जुड़ी श्रद्धालुओं की भावना
शरद पूर्णिमा प्रकृति की सुंदरता, आस्था और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा पर्व है। यह हमें जीवन में शांति, संतुलन और सकारात्मक सोच का महत्व समझाता है। चंद्रमा की शीतल रोशनी मन को सुकून देने का प्रतीक है, जबकि मां लक्ष्मी की पूजा परिश्रम, समृद्धि और शुभता की कामना से जुड़ी है।

