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नवरात्रि का नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि


नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के नवम स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन को महानवमी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की आराधना से ज्ञान, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस बार शारदीय नवरात्रि की महानवमी 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन कन्या पूजन, हवन और मां की विशेष पूजा का महत्व है।

 

क्या है मां सिद्धिदात्री की कथा? 

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली दुर्गा हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने भी मां की कृपा से अनेक सिद्धियां प्राप्त की थीं और इन्हीं देवी की कृपा से भगवान शिव की आदि देह देवी की हो गई थी। ये ही देवताओं को नाना प्रकार की सिद्धियां और शक्तियां प्रदान करती हैं। ऋषि-मुनियों को तप की शक्ति देने वाली दुर्गा हैं। अपने साधक को आत्मबल प्रदान कर मनोवांछित वर देने वाली माँ सिद्धिदात्री हैं। यहां तक की हनुमान जी महाराज को भी आठ सिद्धि और नौ निद्धि इन्ही देवी की कृपा से प्राप्त हुईं थी। इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में लिखते हैं - अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता। जानकी माता (सीता) अर्थात भगवती दुर्गा। मान्यता है कि मां की आराधना से भक्तों को ज्ञान, विवेक और जीवन में सही मार्ग चुनने की शक्ति मिलती है। मां सिद्धिदात्री अपने भक्त को अन्न का भोग करवाती हैं साथ ही मां भगवती का यह स्वरूप नवरात्रि की साधना की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।


कैसा है मां सिद्धिदात्री का स्वरूप?

 

मां सिद्धिदात्री कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं और उनका स्वरूप बेहद शांत और दिव्य है। इनकी चार भुजाएं हैं। इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल सुशोभित हैं। लाल रेशमी वस्त्र, स्वर्ण आभूषणों से युक्त, सूर्य के समान मुख पर तेज, चंद्रमा सी शीतल आभा और शरीर से इंद्रधनुष के समान निकलती किरणें प्रतीत होती हैं। माँ के इस स्वरुप की ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित सभी देवता स्तुति करते हैं आकाश से नाग, किनर, यक्ष, गंधर्व और अप्सरा पुष्प वर्षा कर माँ की जय जयकार कर वंदना करते हैं। इनका वाहन सिंह है। यही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं। इन्हीं को माँ शेरवाली के नाम से सम्बोधित किया जाता है। मां अपने भक्तों को ज्ञान, शक्ति और सफलता का आशीर्वाद देती हैं।

कैसे करें मां सिद्धिदात्री का पूजन ?


महानवमी की सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर स्थापित मां की प्रतिमा के आगे दीपक जलाकर मां को गुलाब का फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। मां को हलवा, पूरी, चना और नारियल का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इसके बाद मां के मंत्र का जाप करें। इस दिन दो लांगुर (लड़के) सहित नौ कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर चरण धो कर कुमकुम का तिलक कर चावल लगाएं हाथ में मौली बांधें फिर भोजन कराकर दक्षिणा दें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजन एवं हवन करें।



मां सिद्धिदात्री का मंत्र - ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥



धार्मिक मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता आती है। महानवमी पर मां से परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि सभी के कल्याण और अपने द्वारा की गई जाने अनजाने में भूल-चूक क्षमा याचना कर प्रार्थना करें।


:- रमन शर्मा

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नवरात्रि का नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि


नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के नवम स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन को महानवमी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की आराधना से ज्ञान, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस बार शारदीय नवरात्रि की महानवमी 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन कन्या पूजन, हवन और मां की विशेष पूजा का महत्व है।

 

क्या है मां सिद्धिदात्री की कथा? 

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली दुर्गा हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने भी मां की कृपा से अनेक सिद्धियां प्राप्त की थीं और इन्हीं देवी की कृपा से भगवान शिव की आदि देह देवी की हो गई थी। ये ही देवताओं को नाना प्रकार की सिद्धियां और शक्तियां प्रदान करती हैं। ऋषि-मुनियों को तप की शक्ति देने वाली दुर्गा हैं। अपने साधक को आत्मबल प्रदान कर मनोवांछित वर देने वाली माँ सिद्धिदात्री हैं। यहां तक की हनुमान जी महाराज को भी आठ सिद्धि और नौ निद्धि इन्ही देवी की कृपा से प्राप्त हुईं थी। इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में लिखते हैं - अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता। जानकी माता (सीता) अर्थात भगवती दुर्गा। मान्यता है कि मां की आराधना से भक्तों को ज्ञान, विवेक और जीवन में सही मार्ग चुनने की शक्ति मिलती है। मां सिद्धिदात्री अपने भक्त को अन्न का भोग करवाती हैं साथ ही मां भगवती का यह स्वरूप नवरात्रि की साधना की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।


कैसा है मां सिद्धिदात्री का स्वरूप?

 

मां सिद्धिदात्री कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं और उनका स्वरूप बेहद शांत और दिव्य है। इनकी चार भुजाएं हैं। इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल सुशोभित हैं। लाल रेशमी वस्त्र, स्वर्ण आभूषणों से युक्त, सूर्य के समान मुख पर तेज, चंद्रमा सी शीतल आभा और शरीर से इंद्रधनुष के समान निकलती किरणें प्रतीत होती हैं। माँ के इस स्वरुप की ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित सभी देवता स्तुति करते हैं आकाश से नाग, किनर, यक्ष, गंधर्व और अप्सरा पुष्प वर्षा कर माँ की जय जयकार कर वंदना करते हैं। इनका वाहन सिंह है। यही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं। इन्हीं को माँ शेरवाली के नाम से सम्बोधित किया जाता है। मां अपने भक्तों को ज्ञान, शक्ति और सफलता का आशीर्वाद देती हैं।

कैसे करें मां सिद्धिदात्री का पूजन ?


महानवमी की सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर स्थापित मां की प्रतिमा के आगे दीपक जलाकर मां को गुलाब का फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। मां को हलवा, पूरी, चना और नारियल का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इसके बाद मां के मंत्र का जाप करें। इस दिन दो लांगुर (लड़के) सहित नौ कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर चरण धो कर कुमकुम का तिलक कर चावल लगाएं हाथ में मौली बांधें फिर भोजन कराकर दक्षिणा दें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजन एवं हवन करें।



मां सिद्धिदात्री का मंत्र - ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥



धार्मिक मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता आती है। महानवमी पर मां से परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि सभी के कल्याण और अपने द्वारा की गई जाने अनजाने में भूल-चूक क्षमा याचना कर प्रार्थना करें।


:- रमन शर्मा