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हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने, व्रत रखने और दान-पुण्य करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक यह व्रत करने से मनुष्य को अपने पापों से मुक्ति पाने और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत केवल और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने कर्मों पर विचार करने, गलतियों से सीखने और जीवन में अच्छे आचरण को अपनाने की प्रेरणा भी देती है। साल 2026 में पापांकुशा एकादशी का व्रत 22 अक्टूबर (गुरुवार) को है। आइए जानते हैं इस एकादशी की पूजा विधि, पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व।
पापांकुशा एकादशी की पूजा विधि
पापांकुशा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल पर श्रीहरि की प्रतिमा या लाडुगोपाल को पीले फूल, फल तथा तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करें और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना फलदायी होता हैं, एकादशी व्रत माहात्म्य को कहना या सुनना चाहिए, भगवान को फल, मिष्ठान का भोग लगा कर आरती करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें। एकादशी के व्रत का पारण अगले दिन निर्धारित समय पर किया जाता है।
पापांकुशा एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी के बारे में जानने की इच्छा जताई। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा कि इस एकादशी का क्या नाम है, इसका व्रत कैसे किया जाता है और इसे रखने से किस फल की प्राप्ति होती है।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है तथा उसे अपने पापों से मुक्ति पाने का मार्ग मिलता है। इसके महत्व को समझाने के लिए श्रीकृष्ण ने एक बहेलिए की कथा सुनाई।
प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। उसका जीवन शिकार, हिंसा, लूटपाट और दूसरे गलत कामों में बीता था। उसने कभी अपने कर्मों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा, लेकिन जब उसके जीवन का अंतिम समय नजदीक आया, तो उसे मृत्यु का भय सताने लगा। कथा के अनुसार, यमदूतों ने बहेलिए को बताया कि अगले दिन वे उसे लेने आएंगे। यह सुनकर वह घबरा गया। उसे अपने जीवन में किए गए पाप कर्म याद आने लगे और वह सोचने लगा कि अब अपने उद्धार के लिए क्या करे ? अपने पापों से मुक्ति का उपाय खोजते हुए वह महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचा। उसने ऋषि के चरणों में गिरकर अपनी गलतियों को स्वीकार किया और उनसे प्रार्थना की, कि वे उसे ऐसा रास्ता बताएं, जिससे उसे अपने पापों से छुटकारा मिल सके और मोक्ष की प्राप्ति हो।

