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नवरात्रि का चौथा दिन: मां कूष्मांडा की पूजा विधि

नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी वजह से उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति भी कहा जाता है। कुष्मांडा देवी का निवास सूर्यमंडल के अंदर माना जाता है इसलिए ये सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी हैं। मां की आराधना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता प्राप्त होती है।

 

क्या है मां कूष्मांडा की कथा ?

 

श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले जब चारों ओर अंधकार था और सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी हल्की-सी मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। ये अपनी दिव्य ऊर्जा से पूरे संसार को प्रकाश प्रदान करती हैं। यहाँ तक की सूर्य को प्रकाश भी इन्हीं देवी की कृपा से प्राप्त होता है। इसी कारण मां को सृष्टि की रचनाकार और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। इसलिए माँ कुष्मांडा को जगतजननी कहा जाता है। इनके हाथ में जो अमृत कलश है उस जल से ये अपने साधक को स्वस्थ शरीर प्रदान कर ज्ञान का छींटा देती हैं। इनकी पूजा से भक्तों को जीवन में नई शुरुआत करने की प्रेरणा मिलती है।

 

कैसा है मां कूष्मांडा का स्वरूप ?

 

मां कूष्मांडा का स्वरूप बेहद दिव्य, तेजस्वी और स्वर्ण के समान चमकीला है। ये सिंह पर सवार रहती हैं। दिव्य मणियों से जड़ा मुकुट माँ के मस्तक पर शोभयमान है। ललाट पर सूर्य की भांति गोल बिंदिया है। तीखे-कटीले सौम्य नेत्र हैं, कान में कुण्डल, गले में स्वर्ण व मणियों जड़ित हार माँ ने धारण किये हुए हैं। स्वर्ण जड़ित मोतियों के बाजूबंद, हाथों में स्वर्ण की चूड़ियां व उँगलियों में मुद्रिकाएं पहनी हुई हैं और इनकी आठ भुजाएं हैं। माँ के हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र तथा प्रतीक सुशोभित हैं। इनके एक हाथ में जपमाला भी होती है। इसी कारण इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। कमरबंद सहित पावन चरणों में स्वर्ण की पायल व चांदी के नूपुर सहित मेहँदी लगी हुई है।  

 

कैसे करें मां कूष्मांडा का पूजन ? 

 

नवरात्रि के चौथे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर स्थापित मां की प्रतिमा के आगे दीपक जलाकर मां को फूल, अक्षत, धूप और गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलाकर अर्पित करें। मां को मालपुए का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इसके बाद मां के मंत्र का जाप करें। कुष्मांडा देवी को पेठे का भोग लगाया जाता है और इनके आगे पेठे के फल की बलि देना भी शुभ माना जाता है। माँ को दोनों हाथ जोड़ का प्रणाम करें गलती की छमा याचना करें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

 

मां कूष्मांडा का मंत्र - ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः

 

धार्मिक मान्यता है कि मां कूष्मांडा की पूजा करने से जीवन में उत्साह, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच बढ़ती है। मां की आराधना भक्तों को हर परिस्थिति में आशा बनाए रखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

 

:- रमन शर्मा

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नवरात्रि का चौथा दिन: मां कूष्मांडा की पूजा विधि

नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी वजह से उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति भी कहा जाता है। कुष्मांडा देवी का निवास सूर्यमंडल के अंदर माना जाता है इसलिए ये सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी हैं। मां की आराधना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता प्राप्त होती है।

 

क्या है मां कूष्मांडा की कथा ?

 

श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले जब चारों ओर अंधकार था और सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी हल्की-सी मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। ये अपनी दिव्य ऊर्जा से पूरे संसार को प्रकाश प्रदान करती हैं। यहाँ तक की सूर्य को प्रकाश भी इन्हीं देवी की कृपा से प्राप्त होता है। इसी कारण मां को सृष्टि की रचनाकार और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। इसलिए माँ कुष्मांडा को जगतजननी कहा जाता है। इनके हाथ में जो अमृत कलश है उस जल से ये अपने साधक को स्वस्थ शरीर प्रदान कर ज्ञान का छींटा देती हैं। इनकी पूजा से भक्तों को जीवन में नई शुरुआत करने की प्रेरणा मिलती है।

 

कैसा है मां कूष्मांडा का स्वरूप ?

 

मां कूष्मांडा का स्वरूप बेहद दिव्य, तेजस्वी और स्वर्ण के समान चमकीला है। ये सिंह पर सवार रहती हैं। दिव्य मणियों से जड़ा मुकुट माँ के मस्तक पर शोभयमान है। ललाट पर सूर्य की भांति गोल बिंदिया है। तीखे-कटीले सौम्य नेत्र हैं, कान में कुण्डल, गले में स्वर्ण व मणियों जड़ित हार माँ ने धारण किये हुए हैं। स्वर्ण जड़ित मोतियों के बाजूबंद, हाथों में स्वर्ण की चूड़ियां व उँगलियों में मुद्रिकाएं पहनी हुई हैं और इनकी आठ भुजाएं हैं। माँ के हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र तथा प्रतीक सुशोभित हैं। इनके एक हाथ में जपमाला भी होती है। इसी कारण इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। कमरबंद सहित पावन चरणों में स्वर्ण की पायल व चांदी के नूपुर सहित मेहँदी लगी हुई है।  

 

कैसे करें मां कूष्मांडा का पूजन ? 

 

नवरात्रि के चौथे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर स्थापित मां की प्रतिमा के आगे दीपक जलाकर मां को फूल, अक्षत, धूप और गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलाकर अर्पित करें। मां को मालपुए का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इसके बाद मां के मंत्र का जाप करें। कुष्मांडा देवी को पेठे का भोग लगाया जाता है और इनके आगे पेठे के फल की बलि देना भी शुभ माना जाता है। माँ को दोनों हाथ जोड़ का प्रणाम करें गलती की छमा याचना करें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

 

मां कूष्मांडा का मंत्र - ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः

 

धार्मिक मान्यता है कि मां कूष्मांडा की पूजा करने से जीवन में उत्साह, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच बढ़ती है। मां की आराधना भक्तों को हर परिस्थिति में आशा बनाए रखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

 

:- रमन शर्मा