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नवरात्र : शक्ति, साधना और संस्कारों का महापर्व

नवरात्र हमें दैवीय शक्ति के सत्व को आत्मसात करने की प्रेरणा देने का पर्व है। हिन्दू धर्म की प्राचीन अवधारणाओं में इसी ईश्वरीय शक्ति के देवी स्वरूप का अनेक स्थानों पर वर्णन आता है। शक्ति के जितने भी स्रोत हैं, हमारी जीवन ऊर्जा उन्हीं के इर्द-गिर्द स्पंदित होती है। इस पर्व के माध्यम से हम एक और जहां शक्ति के प्रभुत्व को अंगीकार करते हैं, वहीं दूसरी ओर उसके जीवन में प्रादुर्भाव लेकर जगत के अस्तित्वमान होने तक, शक्ति के ये रूप प्रकृति और प्रवृत्ति के परिचायक भी रहे हैं। ये रूप सदा-सर्वदा प्रत्येक प्राणों के साथ चलते हैं। यहां तक कि सूक्ष्म और न दिखायी देने वाले जीव-जंतुओं तक के जीवन स्पंदन में इसी अदृश्य शक्ति का हाथ होता है।

 

नवरात्र के अवसर पर हम देवी के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं, जिसमें पहला स्वरूप देवी शैलपुत्री का है। शिव कल्याण के देव हैं और मां शैलपुत्री कल्याणी! देवी का यह स्वरूप प्रकृति के वर्चस्व की स्वीकारोक्ति है। प्रकृति का संरक्षण करो, उसे मां की तरह मान कर उसका ध्यान रखो, तभी शक्ति का संतुलन बना रहेगा। उसका तिरस्कार मत करो, नहीं उसका अधिक दोहन करो।

 

पर्वत शिव जी के कार्यस्थल रहे हैं, जबकि शैलपुत्री का वहां के कण-कण में वास है। शैलपुत्री जल की भी प्रतीक है और जल ही जीवन शक्ति का मुख्य स्रोत है। भारत के प्रायः समस्त धर्म ग्रंथों में प्रकृति के समन्वय और संतुलन की सुंदर प्रेरणाएं देखने को मिलती हैं।

 

देवी का दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी, तीसरा मां चंद्रघंटा, चौथा कृष्मांडा, पांचवां स्कंदमाता, छटा कात्यायनी, सातवां कालरत्रि, आठवां महागौरी तथा नौवां स्वरूप मां सिद्धिदात्री का है। इनमें देवी भगवती के पांच स्वरूप शिवदूती के हैं। छठी देवी कात्यायनी का स्वरूप थोड़ा अलग है। आमतौर पर पिता का कुल पुत्र से चला करता है, पुत्री से नहीं परन्तु ऋषि कात्यायन को दिए गए वरदान के कारण कात्यायनी देवी के स्वरूप में स्त्री सत्ता के वर्चस्व को गति मिल रही है। सप्तम स्वरूप मां कालरत्रि का है। काली काल हैं। काल को जीतने का काम भी काली माँ ही कर सकती हैं। महाकाल यानि शिव का काम भी यही देवी आसान करती हैं। अतीत की ओर देखें, तो विभिन्न अवसरों पर अनेक महान विभूतियों ने काली माता के शक्ति स्वरूप से प्रेरणा और सामर्थ्य अर्जित की है। ऐसा ही एक उदाहरण गुरु गोविंद सिंह के जीवन में मिलता है, जब वे अपने संघर्ष काल में दैवीय शक्ति से अभिप्रेरणा को स्वीकारते हैं, उनको आत्मकथा विचित्र नाटक में वर्णित है-

 

हेमकुंड पर्वत है जहां, सप्त सिंह सोवत हैं तहां।

वहां हम अधिक तपस्या साधी, महाकाल-कालका अराधी।

 

आठवीं देवी महागौरी हैं। यह नारी शक्ति का मुख्य भाव है, गृहलक्ष्मी का

भाव, जहां नारी अपने समस्त उत्तरदायित्वों का हँसते-मुस्कराते निर्वहन करती है। स्त्री को शक्ति स्वरूपा समझो। मां, बहन, पत्नी, पुत्री, बुआ, मौसी और न जाने किन-किन रूपों में वह महागौरी ही है। नौवीं देवी सिद्धिदात्री तमाम कार्यों के सिद्ध होने यानि परिपूर्णता को द्योतक हैं।

 

अहमेव वात इव प्रवाभ्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।

परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव ।।

 

सिद्धिदात्री देवी कहती हैं कि हे जीव मेरे बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता। मैं चारो ओर हूं। मुझ से ही जगत है। इस ब्रह्मांड का अस्तित्व मुझसे है। मुझसे सृष्टि और समष्टि है।

 

आद्य शक्ति से जग उपजाया दूसरा ना कोय।

वास्तविक अर्थ में यही नवरात्र की शक्ति है। अपने अंदर की ऊर्जा को पहचानना। दूसरे की ऊर्जा का सम्मान करना। प्रातः और संध्याकाल में श्री दुर्गा सप्तसती का पाठ हमें जीवन के अनेक संकटों से उबारता है। इस ग्रंथ में हमें दैवीय शक्ति की सर्वोच्च प्रतिष्ठा के दर्शन होते हैं। नारी के विविध गरिमामयी स्वरूपों का प्रदर्शन। देवी दुर्गा सजग हैं, सक्षम हैं, सत्य की पक्षधर है, प्रगतिशील है, अभूतपूर्व, आनंदमयी हैं। जरूरत पड़े तो वे अत्यंत क्रूर और अतिशय दयालु भी हैं। देवी के समस्त स्वरूप व्यक्तित्व के विरोधाभासों को संतुलन के साथ जीने की प्रेरणा देते हैं। दुर्गा में जितनी विशेषताएं हैं वे किसी भी स्त्री में हो सकती है, बशर्ते वो परम सात्विक हो।

 

सर्वदेवशरीरेभ्यो वाविभूतामितप्रभा।

त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः साक्षन्महिषमर्दिनी।।

 

शास्त्र पर गौर करें तो दुर्गा का प्रादुर्भाव अत्याचारियों से संघर्ष और उनके शमन के लिए हुआ था। दुर्गा त्रि शक्ति का समन्वय थीं, अर्थात उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सम्मिलित शक्तियों के परिणाम से हुई थी।

मातृका रहस्य के अनुसार वह तीन गुणों से समन्वित तथा मूर्तिमान परम कुंडली है। यही नहीं उसी के संयोग से ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र की सत्ता है। इसीलिए दुर्गा देवी अजेय रहीं। उनके सच्चे साधक को भी कभी पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता। उनके अवतरण के संदर्भ में उक्त तथ्य की पुष्टि इस श्लोक से होती है।

 

हरिब्रह्मात्कम वर्ण गुणत्रय समन्वितम।

इकारं परमेशानि स्वयं कुंडली मूर्तिमान।

ब्रह्मा विष्णु मयं वर्ण तथा रुद्रमय सदा।।

 

शक्ति का संच्च भर नहीं करना है। उसके यथोचित अनुप्रयोग की भी दरकार अनिवार्य तत्व है। सकल विश्व के समग्र कल्याण हेतु निरपेक्ष रूप से शक्ति का संयुक्तीकरण भी आवश्यक है।

भगवान शिव का शिवाच भी महाशक्ति को उल्लास रूपी सन्निधि से ती स्फुरित होता है।

 

जगत्कारणमापन्नः शिवो यो मुनिसत्तमाः।

तस्यापि साभवच्छकित्सया हीनो निरर्थकः ।।

 

आदि शंकर द्वारा विश्व के सम्मुख प्रकट सौंदर्य लहरी में भी ऐसा ही माना गया है।

 

शिवः शक्तया युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभावितुम।

न चेदेवं देवो न खलु कुशलं स्पन्दितुमपि ।।

 

शक्ति के अभाव में शिव भी मात्र शव ही रह जाते हैं। शिव में निहित जो इंकार की मात्रा है, वह शक्ति की द्योतक है। काली का एक स्वरूप जिसमें शिव उनके चरणों में लेटे हैं, इसी भाव का प्रतिनिधित्व करता है।

 

शक्ति विना महेशानी प्रेतत्वं तस्य निश्चितम।

शक्ति संयोग मात्रेण कर्मकर्ता सदाशिवः ।

इकारः सर्ववर्णानां शक्तितत्वात्कारणंमतं ।।

 

देवी भगवती जगतमाता हैं। वे मनुष्यों की ही नहीं अपितु सबकी मां है और सम्पूर्ण प्राणिमात्र उनकी संतानें।

 

देवी होकाग्र आसीत ।

सैव जगदंडमसूजत सर्वमजिजनत ।।

 

काम क्रोधो दौ पशु इमामेव मनसा बलिमर्पयेत ।।

अर्थात- अपने समस्त कर्मों को जब साधक निष्कल परब्रह्म को समर्पित कर देता है, तो यह कर्म समर्पण ही शास्त्र की दृष्टि में मांस है।

इतने सारे साम्य बताने के पोछे उद्देश्य एकमात्र यहाँ है कि देवी दुर्गा की स्तुति और पूजन सिर्फ उपवास तक सीमित नहीं समझना चाहिए अपितु उनके सच्चे भक्त होने का तात्पर्य है स्वयं में दैवीय गुणों का अधिष्ठान करना। नवरात्र एक ऐसा सुअवसर है जब हम इन गुणों को स्वयं में जगा सकते हैं।

 

:- सभार

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नवरात्र : शक्ति, साधना और संस्कारों का महापर्व

नवरात्र हमें दैवीय शक्ति के सत्व को आत्मसात करने की प्रेरणा देने का पर्व है। हिन्दू धर्म की प्राचीन अवधारणाओं में इसी ईश्वरीय शक्ति के देवी स्वरूप का अनेक स्थानों पर वर्णन आता है। शक्ति के जितने भी स्रोत हैं, हमारी जीवन ऊर्जा उन्हीं के इर्द-गिर्द स्पंदित होती है। इस पर्व के माध्यम से हम एक और जहां शक्ति के प्रभुत्व को अंगीकार करते हैं, वहीं दूसरी ओर उसके जीवन में प्रादुर्भाव लेकर जगत के अस्तित्वमान होने तक, शक्ति के ये रूप प्रकृति और प्रवृत्ति के परिचायक भी रहे हैं। ये रूप सदा-सर्वदा प्रत्येक प्राणों के साथ चलते हैं। यहां तक कि सूक्ष्म और न दिखायी देने वाले जीव-जंतुओं तक के जीवन स्पंदन में इसी अदृश्य शक्ति का हाथ होता है।

 

नवरात्र के अवसर पर हम देवी के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं, जिसमें पहला स्वरूप देवी शैलपुत्री का है। शिव कल्याण के देव हैं और मां शैलपुत्री कल्याणी! देवी का यह स्वरूप प्रकृति के वर्चस्व की स्वीकारोक्ति है। प्रकृति का संरक्षण करो, उसे मां की तरह मान कर उसका ध्यान रखो, तभी शक्ति का संतुलन बना रहेगा। उसका तिरस्कार मत करो, नहीं उसका अधिक दोहन करो।

 

पर्वत शिव जी के कार्यस्थल रहे हैं, जबकि शैलपुत्री का वहां के कण-कण में वास है। शैलपुत्री जल की भी प्रतीक है और जल ही जीवन शक्ति का मुख्य स्रोत है। भारत के प्रायः समस्त धर्म ग्रंथों में प्रकृति के समन्वय और संतुलन की सुंदर प्रेरणाएं देखने को मिलती हैं।

 

देवी का दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी, तीसरा मां चंद्रघंटा, चौथा कृष्मांडा, पांचवां स्कंदमाता, छटा कात्यायनी, सातवां कालरत्रि, आठवां महागौरी तथा नौवां स्वरूप मां सिद्धिदात्री का है। इनमें देवी भगवती के पांच स्वरूप शिवदूती के हैं। छठी देवी कात्यायनी का स्वरूप थोड़ा अलग है। आमतौर पर पिता का कुल पुत्र से चला करता है, पुत्री से नहीं परन्तु ऋषि कात्यायन को दिए गए वरदान के कारण कात्यायनी देवी के स्वरूप में स्त्री सत्ता के वर्चस्व को गति मिल रही है। सप्तम स्वरूप मां कालरत्रि का है। काली काल हैं। काल को जीतने का काम भी काली माँ ही कर सकती हैं। महाकाल यानि शिव का काम भी यही देवी आसान करती हैं। अतीत की ओर देखें, तो विभिन्न अवसरों पर अनेक महान विभूतियों ने काली माता के शक्ति स्वरूप से प्रेरणा और सामर्थ्य अर्जित की है। ऐसा ही एक उदाहरण गुरु गोविंद सिंह के जीवन में मिलता है, जब वे अपने संघर्ष काल में दैवीय शक्ति से अभिप्रेरणा को स्वीकारते हैं, उनको आत्मकथा विचित्र नाटक में वर्णित है-

 

हेमकुंड पर्वत है जहां, सप्त सिंह सोवत हैं तहां।

वहां हम अधिक तपस्या साधी, महाकाल-कालका अराधी।

 

आठवीं देवी महागौरी हैं। यह नारी शक्ति का मुख्य भाव है, गृहलक्ष्मी का

भाव, जहां नारी अपने समस्त उत्तरदायित्वों का हँसते-मुस्कराते निर्वहन करती है। स्त्री को शक्ति स्वरूपा समझो। मां, बहन, पत्नी, पुत्री, बुआ, मौसी और न जाने किन-किन रूपों में वह महागौरी ही है। नौवीं देवी सिद्धिदात्री तमाम कार्यों के सिद्ध होने यानि परिपूर्णता को द्योतक हैं।

 

अहमेव वात इव प्रवाभ्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।

परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव ।।

 

सिद्धिदात्री देवी कहती हैं कि हे जीव मेरे बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता। मैं चारो ओर हूं। मुझ से ही जगत है। इस ब्रह्मांड का अस्तित्व मुझसे है। मुझसे सृष्टि और समष्टि है।

 

आद्य शक्ति से जग उपजाया दूसरा ना कोय।

वास्तविक अर्थ में यही नवरात्र की शक्ति है। अपने अंदर की ऊर्जा को पहचानना। दूसरे की ऊर्जा का सम्मान करना। प्रातः और संध्याकाल में श्री दुर्गा सप्तसती का पाठ हमें जीवन के अनेक संकटों से उबारता है। इस ग्रंथ में हमें दैवीय शक्ति की सर्वोच्च प्रतिष्ठा के दर्शन होते हैं। नारी के विविध गरिमामयी स्वरूपों का प्रदर्शन। देवी दुर्गा सजग हैं, सक्षम हैं, सत्य की पक्षधर है, प्रगतिशील है, अभूतपूर्व, आनंदमयी हैं। जरूरत पड़े तो वे अत्यंत क्रूर और अतिशय दयालु भी हैं। देवी के समस्त स्वरूप व्यक्तित्व के विरोधाभासों को संतुलन के साथ जीने की प्रेरणा देते हैं। दुर्गा में जितनी विशेषताएं हैं वे किसी भी स्त्री में हो सकती है, बशर्ते वो परम सात्विक हो।

 

सर्वदेवशरीरेभ्यो वाविभूतामितप्रभा।

त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः साक्षन्महिषमर्दिनी।।

 

शास्त्र पर गौर करें तो दुर्गा का प्रादुर्भाव अत्याचारियों से संघर्ष और उनके शमन के लिए हुआ था। दुर्गा त्रि शक्ति का समन्वय थीं, अर्थात उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सम्मिलित शक्तियों के परिणाम से हुई थी।

मातृका रहस्य के अनुसार वह तीन गुणों से समन्वित तथा मूर्तिमान परम कुंडली है। यही नहीं उसी के संयोग से ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र की सत्ता है। इसीलिए दुर्गा देवी अजेय रहीं। उनके सच्चे साधक को भी कभी पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता। उनके अवतरण के संदर्भ में उक्त तथ्य की पुष्टि इस श्लोक से होती है।

 

हरिब्रह्मात्कम वर्ण गुणत्रय समन्वितम।

इकारं परमेशानि स्वयं कुंडली मूर्तिमान।

ब्रह्मा विष्णु मयं वर्ण तथा रुद्रमय सदा।।

 

शक्ति का संच्च भर नहीं करना है। उसके यथोचित अनुप्रयोग की भी दरकार अनिवार्य तत्व है। सकल विश्व के समग्र कल्याण हेतु निरपेक्ष रूप से शक्ति का संयुक्तीकरण भी आवश्यक है।

भगवान शिव का शिवाच भी महाशक्ति को उल्लास रूपी सन्निधि से ती स्फुरित होता है।

 

जगत्कारणमापन्नः शिवो यो मुनिसत्तमाः।

तस्यापि साभवच्छकित्सया हीनो निरर्थकः ।।

 

आदि शंकर द्वारा विश्व के सम्मुख प्रकट सौंदर्य लहरी में भी ऐसा ही माना गया है।

 

शिवः शक्तया युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभावितुम।

न चेदेवं देवो न खलु कुशलं स्पन्दितुमपि ।।

 

शक्ति के अभाव में शिव भी मात्र शव ही रह जाते हैं। शिव में निहित जो इंकार की मात्रा है, वह शक्ति की द्योतक है। काली का एक स्वरूप जिसमें शिव उनके चरणों में लेटे हैं, इसी भाव का प्रतिनिधित्व करता है।

 

शक्ति विना महेशानी प्रेतत्वं तस्य निश्चितम।

शक्ति संयोग मात्रेण कर्मकर्ता सदाशिवः ।

इकारः सर्ववर्णानां शक्तितत्वात्कारणंमतं ।।

 

देवी भगवती जगतमाता हैं। वे मनुष्यों की ही नहीं अपितु सबकी मां है और सम्पूर्ण प्राणिमात्र उनकी संतानें।

 

देवी होकाग्र आसीत ।

सैव जगदंडमसूजत सर्वमजिजनत ।।

 

काम क्रोधो दौ पशु इमामेव मनसा बलिमर्पयेत ।।

अर्थात- अपने समस्त कर्मों को जब साधक निष्कल परब्रह्म को समर्पित कर देता है, तो यह कर्म समर्पण ही शास्त्र की दृष्टि में मांस है।

इतने सारे साम्य बताने के पोछे उद्देश्य एकमात्र यहाँ है कि देवी दुर्गा की स्तुति और पूजन सिर्फ उपवास तक सीमित नहीं समझना चाहिए अपितु उनके सच्चे भक्त होने का तात्पर्य है स्वयं में दैवीय गुणों का अधिष्ठान करना। नवरात्र एक ऐसा सुअवसर है जब हम इन गुणों को स्वयं में जगा सकते हैं।

 

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