सनातन धर्म में प्रत्येक धार्मिक कार्य का शुभारंभ दीप प्रज्जवलित करने से होता है। धर्म ग्रंथों व पुराणों की मान्यतानुसार अग्निदेव को साक्षी मानकर उनकी उपस्थिति में किए गए कार्य अवश्य ही सफल होते हैं। अग्नि पृथ्वी पर सूर्य का परिवर्तित रूप है, इसलिए किसी भी देवी-देवता के पूजन में समय ऊर्जा को केन्द्रीभूत करने के लिए दीपक प्रज्जवलित किया जाता है। नवरात्र के नौ दिनों में महाशक्ति की आराधना करने वाले जातक अखंड ज्योति जलाकर मां दुर्गा की उपासना करते हैं। अखंड का अर्थ है जो खंडित न हो और इस दीपक को प्रथम नवरात्र अर्थात प्रतिपदा से प्रज्वलित किया जाता है जो अष्टमी व नवमी तक लगातार कन्या पूजन तक प्रज्वलित रहता है। नवदुर्गा के इस अखंड दीप से घर में दु:खों का नाश होता है, सुखों का वास होता है साथ ही मन में शांति और बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश होता है।
नवरात्र में माँ दुर्गा की अखंड ज्योति जलाने के लिए पीतल या मिट्टी के बड़े दीपक में कलावे की सहायता से बड़ी बाती बना लें। दीपक के नीचे गंगा जल डाल कर किसी बर्तन में, साबुत चावल में हल्दी मिला कर अष्टदल कमल बना लें या चावल की ढेरी बना कर दीपक को रखें। आप अपनी क्षमता अनुसार तिल का तेल, नारियल का तेल या गाय के शुद्ध देसी घी द्वारा ज्योति को प्रज्वलित करें और माँ दुर्गा का ध्यान करके मंत्र के माध्यम से आह्वान करें।
मंत्र - सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते
अखंड दीप प्रज्वलित होने के बाद माँ के चरणों में प्रार्थना कर प्रणाम करें और दीप की रक्षा का भार स्वयं माँ भगवती के चरणों में सौंप दें। जिस स्थान पर अखंड ज्योति जल रही हो वहां की स्वच्छता और पवित्रता को बनाए रखें। घर में कलेश इत्यादि ना करें व सकारात्मक वातावरण बनाए रखें। समय-समय पर आवश्यकता अनुसार दीपक में घी डालते रहें । सम्भव हो तो अखंड ज्योति के सन्मुख भजन व दुर्गा सप्तशती पाठ करना चाहिए, जिससे अनंत सुखों की प्राप्ति होती है व जातक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। देवी दुर्गा की पवित्र पावन ज्योति को सदैव दूर से ही प्रणाम करना चाहिए। कभी भी अखंड ज्योति के ऊपर से हाथ घुमा कर आरती ना लें क्योंकि ज्योति माँ का स्वरुप होती है हम सभी माँ के बच्चे हैं और बच्चे कभी भी माँ के सर पर हाथ नहीं फेरते, बल्कि माँ बच्चों के सर पर हाथ फेरती हैं।
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्र में जलने वाली अखंड ज्योत देवी दुर्गा की ही शक्ति का स्वरुप होती है जो तीन महाशक्तियों को समर्पित होती है । दीपक में डाला गया गाय का शुद्ध घी धन-धान्य की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक होता है। दीपक की बाती ज्ञान और बुद्धि की देवी महासरस्वती की प्रतीक होती है और जल रही लौ माँ ज्वाला अर्थात देवी महाकाली की प्रतीक होती है। इन तीनों महाशक्तियों के ही प्रभाव से संसार में सभी शक्तियां विद्यमान हैं। अखंड दीप के नीचे की ओर देवी की चौंसठ योगनियां, मध्य में नव दुर्गा और ऊपर की ओर दस महाविद्या सूक्ष्म रूप से विद्यमान होती हैं । साथ ही घर के अंदर साक्षात हनुमान जी महाराज और घर के बाहर बाबा क्षेत्रपाल भैरव ज्योति की रक्षा में सदैव तत्पर रहते हैं।
आज भी देवी के सभी शक्तिपीठों और सर्व विख्यात कटड़ा में त्रिकूट पर्वत पर माता वैष्णो देवी की प्राचीन गुफा में सोने और चांदी के पात्र में कई वर्षों से निरन्तर अखंड ज्योति जलती आ रही है। जो भी भक्त श्रद्धा भाव से माँ भगवती की अखंड ज्योति जलाकर माँ का आह्वाहन करते हैं माँ जगदम्बा सदैव उनके कुल की रक्षा कर सुख-सम्पदा और अन्न-धन के भंडार भरती हैं।
सनातन धर्म में प्रत्येक धार्मिक कार्य का शुभारंभ दीप प्रज्जवलित करने से होता है। धर्म ग्रंथों व पुराणों की मान्यतानुसार अग्निदेव को साक्षी मानकर उनकी उपस्थिति में किए गए कार्य अवश्य ही सफल होते हैं। अग्नि पृथ्वी पर सूर्य का परिवर्तित रूप है, इसलिए किसी भी देवी-देवता के पूजन में समय ऊर्जा को केन्द्रीभूत करने के लिए दीपक प्रज्जवलित किया जाता है। नवरात्र के नौ दिनों में महाशक्ति की आराधना करने वाले जातक अखंड ज्योति जलाकर मां दुर्गा की उपासना करते हैं। अखंड का अर्थ है जो खंडित न हो और इस दीपक को प्रथम नवरात्र अर्थात प्रतिपदा से प्रज्वलित किया जाता है जो अष्टमी व नवमी तक लगातार कन्या पूजन तक प्रज्वलित रहता है। नवदुर्गा के इस अखंड दीप से घर में दु:खों का नाश होता है, सुखों का वास होता है साथ ही मन में शांति और बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश होता है।
नवरात्र में माँ दुर्गा की अखंड ज्योति जलाने के लिए पीतल या मिट्टी के बड़े दीपक में कलावे की सहायता से बड़ी बाती बना लें। दीपक के नीचे गंगा जल डाल कर किसी बर्तन में, साबुत चावल में हल्दी मिला कर अष्टदल कमल बना लें या चावल की ढेरी बना कर दीपक को रखें। आप अपनी क्षमता अनुसार तिल का तेल, नारियल का तेल या गाय के शुद्ध देसी घी द्वारा ज्योति को प्रज्वलित करें और माँ दुर्गा का ध्यान करके मंत्र के माध्यम से आह्वान करें।
मंत्र - सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते
अखंड दीप प्रज्वलित होने के बाद माँ के चरणों में प्रार्थना कर प्रणाम करें और दीप की रक्षा का भार स्वयं माँ भगवती के चरणों में सौंप दें। जिस स्थान पर अखंड ज्योति जल रही हो वहां की स्वच्छता और पवित्रता को बनाए रखें। घर में कलेश इत्यादि ना करें व सकारात्मक वातावरण बनाए रखें। समय-समय पर आवश्यकता अनुसार दीपक में घी डालते रहें । सम्भव हो तो अखंड ज्योति के सन्मुख भजन व दुर्गा सप्तशती पाठ करना चाहिए, जिससे अनंत सुखों की प्राप्ति होती है व जातक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। देवी दुर्गा की पवित्र पावन ज्योति को सदैव दूर से ही प्रणाम करना चाहिए। कभी भी अखंड ज्योति के ऊपर से हाथ घुमा कर आरती ना लें क्योंकि ज्योति माँ का स्वरुप होती है हम सभी माँ के बच्चे हैं और बच्चे कभी भी माँ के सर पर हाथ नहीं फेरते, बल्कि माँ बच्चों के सर पर हाथ फेरती हैं।
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्र में जलने वाली अखंड ज्योत देवी दुर्गा की ही शक्ति का स्वरुप होती है जो तीन महाशक्तियों को समर्पित होती है । दीपक में डाला गया गाय का शुद्ध घी धन-धान्य की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक होता है। दीपक की बाती ज्ञान और बुद्धि की देवी महासरस्वती की प्रतीक होती है और जल रही लौ माँ ज्वाला अर्थात देवी महाकाली की प्रतीक होती है। इन तीनों महाशक्तियों के ही प्रभाव से संसार में सभी शक्तियां विद्यमान हैं। अखंड दीप के नीचे की ओर देवी की चौंसठ योगनियां, मध्य में नव दुर्गा और ऊपर की ओर दस महाविद्या सूक्ष्म रूप से विद्यमान होती हैं । साथ ही घर के अंदर साक्षात हनुमान जी महाराज और घर के बाहर बाबा क्षेत्रपाल भैरव ज्योति की रक्षा में सदैव तत्पर रहते हैं।
आज भी देवी के सभी शक्तिपीठों और सर्व विख्यात कटड़ा में त्रिकूट पर्वत पर माता वैष्णो देवी की प्राचीन गुफा में सोने और चांदी के पात्र में कई वर्षों से निरन्तर अखंड ज्योति जलती आ रही है। जो भी भक्त श्रद्धा भाव से माँ भगवती की अखंड ज्योति जलाकर माँ का आह्वाहन करते हैं माँ जगदम्बा सदैव उनके कुल की रक्षा कर सुख-सम्पदा और अन्न-धन के भंडार भरती हैं।