शारदीय नवरात्रि का पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा, कलश स्थापना और जौ बोने की विधि
नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। मान्यता है कि मां की महिमा सुनने और उनका गुणगान करने से भी भक्तों को पुण्य फल प्राप्त होता है। मां शैलपुत्री की पूजा सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाल जीवन की कामना के साथ की जाती है।
कौन हैं मां शैलपुत्री ?
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण देवी को शैलपुत्री कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण अपने प्राण त्याग दिए थे। यह जानकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित और दु:खी हुए तथा उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर दिया। इसके बाद देवी सती ने महादेव की पति रूप में प्राप्त करने और सृष्टि के विस्तार हेतु शैलराज हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया और मां शैलपुत्री के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मां का स्वरूप बेहद शांत और दिव्य है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का सुंदर फूल सुशोभित है। वे नंदी बैल पर सवार रहती हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में मां शैलपुत्री का संबंध चंद्रमा से माना जाता है।
पहले नवरात्र पर कैसे करें कलश स्थापना ?
सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पूजा स्थल की सफाई करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद पूजा स्थान पर मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी भरकर जौ बोएं और हल्का पानी छिड़कें। नवरात्र के दौरान जौ में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जौ की अच्छी वृद्धि घर में सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। अब तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरें। उसमें सुपारी, अक्षत और सिक्का डालें। कलश के मुख पर कलावा बांध कर आम या अशोक के पत्ते लगाकर नारियल पर एक साबुत पान का पत्ता, एक लोंग का जोड़ा, हरी इलायची, एक सुपारी और कुछ चीनी के दाने लगाकर लाल चुनरी से लपेट कर कलावा बांधें । साथ ही कलश पर रोली से सुंदर स्वस्तिक बना कर स्थापित करें। कलश को जौ के पात्र के पास रखें। कलश स्थापना का शुभ समय सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक एवं अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:49 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक है।
कैसे करें मां शैलपुत्री का पूजन ?
सबसे पहले गणेश जी और कलश का पूजन करें। फिर मां शैलपुत्री को फूल, अक्षत अर्पित कर धूप-दीप जलाएं। इस दिन से आप दुर्गा सप्तशती, महिषासुरमर्दनी स्तोत्र, दुर्गा चालीसा आदि पाठ का शुभारंभ कर सकते हैं। गाय के गोबर से बने सूखे उपले को जला कर किसी बर्तन में पूजा स्थल पर रखें और धूप, कपूर के साथ जला कर गाय के शुद्ध देसी घी द्वारा 2 लौंग के जोड़े, लोबान, गूगल और बताशा आदि अर्पित कर रोली और जल का छींटा दें और भाव से माँ भगवती की आरती करें। जयकारा लगाएं और फिर माँ को फल और सफेद रंग की दूध से बनी मिठाई आदि का भोग लगा कर माथा टेकें। इसके बाद मां के मंत्र ‘ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः’ का जाप करें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें। इस प्रक्रिया को नवरात्र के समय प्रत्येक दिन दोहराएं, बस देवियों के नाम बदलते जाएंगे ।
शारदीय नवरात्रि का पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा, कलश स्थापना और जौ बोने की विधि
नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। मान्यता है कि मां की महिमा सुनने और उनका गुणगान करने से भी भक्तों को पुण्य फल प्राप्त होता है। मां शैलपुत्री की पूजा सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाल जीवन की कामना के साथ की जाती है।
कौन हैं मां शैलपुत्री ?
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण देवी को शैलपुत्री कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण अपने प्राण त्याग दिए थे। यह जानकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित और दु:खी हुए तथा उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर दिया। इसके बाद देवी सती ने महादेव की पति रूप में प्राप्त करने और सृष्टि के विस्तार हेतु शैलराज हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया और मां शैलपुत्री के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मां का स्वरूप बेहद शांत और दिव्य है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का सुंदर फूल सुशोभित है। वे नंदी बैल पर सवार रहती हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में मां शैलपुत्री का संबंध चंद्रमा से माना जाता है।
पहले नवरात्र पर कैसे करें कलश स्थापना ?
सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पूजा स्थल की सफाई करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद पूजा स्थान पर मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी भरकर जौ बोएं और हल्का पानी छिड़कें। नवरात्र के दौरान जौ में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जौ की अच्छी वृद्धि घर में सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। अब तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरें। उसमें सुपारी, अक्षत और सिक्का डालें। कलश के मुख पर कलावा बांध कर आम या अशोक के पत्ते लगाकर नारियल पर एक साबुत पान का पत्ता, एक लोंग का जोड़ा, हरी इलायची, एक सुपारी और कुछ चीनी के दाने लगाकर लाल चुनरी से लपेट कर कलावा बांधें । साथ ही कलश पर रोली से सुंदर स्वस्तिक बना कर स्थापित करें। कलश को जौ के पात्र के पास रखें। कलश स्थापना का शुभ समय सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक एवं अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:49 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक है।
कैसे करें मां शैलपुत्री का पूजन ?
सबसे पहले गणेश जी और कलश का पूजन करें। फिर मां शैलपुत्री को फूल, अक्षत अर्पित कर धूप-दीप जलाएं। इस दिन से आप दुर्गा सप्तशती, महिषासुरमर्दनी स्तोत्र, दुर्गा चालीसा आदि पाठ का शुभारंभ कर सकते हैं। गाय के गोबर से बने सूखे उपले को जला कर किसी बर्तन में पूजा स्थल पर रखें और धूप, कपूर के साथ जला कर गाय के शुद्ध देसी घी द्वारा 2 लौंग के जोड़े, लोबान, गूगल और बताशा आदि अर्पित कर रोली और जल का छींटा दें और भाव से माँ भगवती की आरती करें। जयकारा लगाएं और फिर माँ को फल और सफेद रंग की दूध से बनी मिठाई आदि का भोग लगा कर माथा टेकें। इसके बाद मां के मंत्र ‘ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः’ का जाप करें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें। इस प्रक्रिया को नवरात्र के समय प्रत्येक दिन दोहराएं, बस देवियों के नाम बदलते जाएंगे ।