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शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि

नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को तप, त्याग, संयम और दृढ़ संकल्प की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां की पूजा करने से भक्तों को धैर्य, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।



क्या है मां ब्रह्मचारिणी की कथा ?



पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। कहा जाता है कि मां ने हजारों वर्षों तक फल और फूल खाकर तप किया। इसके बाद उन्होंने बेल के पत्ते खाना भी छोड़ दिया और लंबे समय तक बिना कुछ खाए-पिए आंधी, तूफान, बारिश और भयंकर सर्दी में भी तपस्या में लीन रहीं। उनकी इसी कठिन साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। कठोर ब्रह्मचर्य और तपस्या करने के कारण ही उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। अपना सर्वस्व भगवान शिव को अर्पण करने के कारण इनका एक नाम अपर्णा भी है।



कैसा है मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ?



मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप बेहद शांत, सरल और तेजस्वी है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में रद्राक्ष की जप माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। उनका यह स्वरूप भक्तों को सिखाता है कि धैर्य, अनुशासन और सच्ची लगन से जीवन की कठिनाइयों पर विजय पाई जा सकती है।

 

कैसे करें मां ब्रह्मचारिणी का पूजन ?


नवरात्रि के दूसरे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर जहाँ मां की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित है। वहां दीपक जलाकर मां को फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। मां ब्रह्मचारिणी को सफेद रंग के फूल चढ़ाना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां को शक्कर, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जा सकता है।


मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र - ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥



इसके बाद मां से परिवार की सुख-शांति, सफलता और जीवन में संयम बनाए रखने की प्रार्थना करें। मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी की आराधना से भक्तों को कठिन समय में भी अपने लक्ष्य पर डटे रहने की प्रेरणा मिलती है।

रमन शर्मा

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नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को तप, त्याग, संयम और दृढ़ संकल्प की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां की पूजा करने से भक्तों को धैर्य, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।



क्या है मां ब्रह्मचारिणी की कथा ?



पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। कहा जाता है कि मां ने हजारों वर्षों तक फल और फूल खाकर तप किया। इसके बाद उन्होंने बेल के पत्ते खाना भी छोड़ दिया और लंबे समय तक बिना कुछ खाए-पिए आंधी, तूफान, बारिश और भयंकर सर्दी में भी तपस्या में लीन रहीं। उनकी इसी कठिन साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। कठोर ब्रह्मचर्य और तपस्या करने के कारण ही उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। अपना सर्वस्व भगवान शिव को अर्पण करने के कारण इनका एक नाम अपर्णा भी है।



कैसा है मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ?



मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप बेहद शांत, सरल और तेजस्वी है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में रद्राक्ष की जप माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। उनका यह स्वरूप भक्तों को सिखाता है कि धैर्य, अनुशासन और सच्ची लगन से जीवन की कठिनाइयों पर विजय पाई जा सकती है।

 

कैसे करें मां ब्रह्मचारिणी का पूजन ?


नवरात्रि के दूसरे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर जहाँ मां की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित है। वहां दीपक जलाकर मां को फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। मां ब्रह्मचारिणी को सफेद रंग के फूल चढ़ाना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां को शक्कर, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जा सकता है।


मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र - ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥



इसके बाद मां से परिवार की सुख-शांति, सफलता और जीवन में संयम बनाए रखने की प्रार्थना करें। मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी की आराधना से भक्तों को कठिन समय में भी अपने लक्ष्य पर डटे रहने की प्रेरणा मिलती है।

रमन शर्मा