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नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। मां कात्यायनी को शक्ति, साहस और अन्याय का नाश करने वाली देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने से भक्तों को आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। देवी कात्यायनी को महिषासुरमर्दनी के नाम से भी जाना जाता है। विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए भी मां कात्यायनी की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
क्या है मां कात्यायनी की कथा ?
पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचारों से जब देवता और पृथ्वीवासी परेशान हो गए, तब सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों को मिलाकर देवी के दिव्य स्वरूप की रचना की। महर्षि कात्यायन ने देवी की कठोर तपस्या की, जब माँ भगवती ने महर्षि को दर्शन दिए तो वरदान मांगने को कहा महर्षि ने अपने कात्यान गोत्र में माँ से जन्म लेने का अनुरोध किया अर्थात अपनी पुत्री के रूप में माँ को माँगा। माँ तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गईं और कालन्तर में महर्षि कात्यायन की इच्छा पूर्ण कर उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और कात्यायनी कहलाईं। बाद में मां ने असुरराज दानव महिषासुर से युद्ध करके उसका वध किया और देवतों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई तो देवताओं ने माँ की महिषासुरमर्दनी नाम से उद्घोष कर आरती उतारी और स्वर्ग में देवराज इंद्र के दरबार में ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने महिषासुरमर्दनी की स्तुति गई। इस प्रकार ये छठी दुर्गा कहलाईं। मां की यह कथा बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है। ये क्वारी कन्याओं को मन भावन वर देती हैं, विवाह की विलंबता को दूर करती हैं और संतान आदि से संपन्न कर सौभाग्य प्रदान करती हैं। ये बृज क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। बृज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ कात्यायनी की ही आराधना की थी। स्वयं श्रीकृष्ण ने माँ की आरधना की और देवी की ही कृपा से श्रीकृष्ण को प्रद्युमन नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई थी।
कैसा है मां कात्यायनी का स्वरूप ?
माँ कात्यायनी का स्वरूप सोने के समान ही चमकीला अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली है। ये सिंह पर सवार रहती हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है जबकि बाकी दो हाथ भक्तों को आशीर्वाद और अभय प्रदान करते हैं। साथ ही दिव्य सोने और मणियों के हार माँ ने धारण किये हुए हैं कभी ना मुरझाने वाले फूलों की माला माँ ने पहनी हुई है। इनका दिव्य स्वरूप भक्तों में साहस और निर्भयता का संचार करता है।
कैसे करें मां कात्यायनी का पूजन ?

