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दशहरा : बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक

 

भारतीय संस्कृति में दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और मर्यादा की शक्ति में विश्वास का उत्सव है। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला विजयदशमी का त्योहार भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की याद दिलाता है। इस दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। यह परंपरा संदेश देती है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है।

 

कौन था रावण?

 

रावण लंका का शक्तिशाली राजा था। वह ऋषि विश्रवा और कैकसी का पुत्र था। रावण केवल एक पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, कुशल राजनीतिज्ञ और भगवान शिव का परम भक्त भी माना जाता था। उसे संगीत और ज्योतिष का भी ज्ञान था। रावण के दस सिर होने के कारण उसे दशानन और दशग्रीव के नाम से भी जाना जाता है। रावण के दस सिरों को लेकर धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनमें इन्हें मनुष्य के भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक भी माना जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, स्वार्थ और अन्याय जैसी बुराइयां व्यक्ति को विवेक से दूर कर सकती हैं।

 

रावण को मिले थे कौन-से वरदान?

 

रावण ने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और रावण से वरदान मांगने के लिए कहा। तब रावण ने वरदान मांगा कि देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष और कई अन्य शक्तिशाली प्राणी उसका वध नहीं कर सकेंगे। रावण ने मनुष्य को अपने लिए खतरा नहीं समझा और उसे इस सुरक्षा में शामिल नहीं किया। यही कारण बना कि भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में मनुष्य अवतार लेकर उसका अंत किया।

 

कैसे हुआ रावण का अंत?

 

वनवास के दौरान शूर्पणखा के कथित अपमान के बाद रावण ने भगवान राम से प्रतिशोध लेने की योजना बनाई। उसने मारीच की सहायता से स्वर्ण मृग का मायाजाल रचा और साधु का वेश धारण करके माता सीता का हरण कर लिया। वह उन्हें लंका ले गया और अशोक वाटिका में रखा।

 

माता सीता की खोज करते हुए भगवान राम की भेंट हनुमान और सुग्रीव से हुई। वानर सेना की सहायता से उन्होंने समुद्र पार कर लंका पर आक्रमण किया। इसके बाद श्रीराम और रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ। रावण को माता सीता को लौटाने का अवसर मिला, लेकिन उसने अपने अहंकार के कारण ऐसा नहीं किया।

 

युद्ध के अंतिम चरण में विभीषण ने रावण की मृत्यु से जुड़ा रहस्य श्रीराम को बताया। इसी आधार पर श्रीराम ने उसकी नाभि पर प्रहार कर रावण का वध कर दिया और माता सीता को मुक्त कराया। रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम की सलाह पर उसके भाई विभीषण ने उसका अंतिम संस्कार किया। इसके बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया।

 

दशहरा देता है क्या संदेश?

 

विजयदशमी का वास्तविक संदेश केवल रावण के पुतले का दहन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करना है। भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, जबकि रावण का अंत सिखाता है कि अहंकार व्यक्ति की सबसे बड़ी शक्ति को भी उसकी कमजोरी बना सकता है। दशहरे से हमें यह सीखने की जरूरत है कि सच्ची विजय दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार और क्रोध पर जीत हासिल करने में है।

 

रावण का गांव

 

भारत में एक गांव ऐसा भी है जहां दशहरा पर उत्साह नहीं बल्कि शोक मनाया जाता है। ये गांव उत्तरप्रदेश के ग्रेटर नोएडा नें स्थित है जिसका नाम बिसरख है। पौराणिक कथाओं के अनुसार बिसरख गांव का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम पर पड़ा था। गांव का प्राचीन नाम विश्वेशरा था जो बदलकर बिसरख हो गया है। शिवपुराण में भी इस जगह का जिक्र मिलता है और बताया गया है कि ऋषि विश्रवा का यहीं जन्म हुआ था और उन्होंने ही शिवलिंग की स्थापना की थी। दशहरा के मौके पर इस गांव में रावण दहन नहीं होता है लेकिन यज्ञशाला के सामने रावण की मूर्ति रखकर हवन और पूजा की जाती है।

 

:- लता रानी

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भारतीय संस्कृति में दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और मर्यादा की शक्ति में विश्वास का उत्सव है। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला विजयदशमी का त्योहार भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की याद दिलाता है। इस दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। यह परंपरा संदेश देती है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है।

 

कौन था रावण?

 

रावण लंका का शक्तिशाली राजा था। वह ऋषि विश्रवा और कैकसी का पुत्र था। रावण केवल एक पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, कुशल राजनीतिज्ञ और भगवान शिव का परम भक्त भी माना जाता था। उसे संगीत और ज्योतिष का भी ज्ञान था। रावण के दस सिर होने के कारण उसे दशानन और दशग्रीव के नाम से भी जाना जाता है। रावण के दस सिरों को लेकर धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनमें इन्हें मनुष्य के भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक भी माना जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, स्वार्थ और अन्याय जैसी बुराइयां व्यक्ति को विवेक से दूर कर सकती हैं।

 

रावण को मिले थे कौन-से वरदान?

 

रावण ने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और रावण से वरदान मांगने के लिए कहा। तब रावण ने वरदान मांगा कि देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष और कई अन्य शक्तिशाली प्राणी उसका वध नहीं कर सकेंगे। रावण ने मनुष्य को अपने लिए खतरा नहीं समझा और उसे इस सुरक्षा में शामिल नहीं किया। यही कारण बना कि भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में मनुष्य अवतार लेकर उसका अंत किया।

 

कैसे हुआ रावण का अंत?

 

वनवास के दौरान शूर्पणखा के कथित अपमान के बाद रावण ने भगवान राम से प्रतिशोध लेने की योजना बनाई। उसने मारीच की सहायता से स्वर्ण मृग का मायाजाल रचा और साधु का वेश धारण करके माता सीता का हरण कर लिया। वह उन्हें लंका ले गया और अशोक वाटिका में रखा।

 

माता सीता की खोज करते हुए भगवान राम की भेंट हनुमान और सुग्रीव से हुई। वानर सेना की सहायता से उन्होंने समुद्र पार कर लंका पर आक्रमण किया। इसके बाद श्रीराम और रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ। रावण को माता सीता को लौटाने का अवसर मिला, लेकिन उसने अपने अहंकार के कारण ऐसा नहीं किया।

 

युद्ध के अंतिम चरण में विभीषण ने रावण की मृत्यु से जुड़ा रहस्य श्रीराम को बताया। इसी आधार पर श्रीराम ने उसकी नाभि पर प्रहार कर रावण का वध कर दिया और माता सीता को मुक्त कराया। रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम की सलाह पर उसके भाई विभीषण ने उसका अंतिम संस्कार किया। इसके बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया।

 

दशहरा देता है क्या संदेश?

 

विजयदशमी का वास्तविक संदेश केवल रावण के पुतले का दहन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करना है। भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, जबकि रावण का अंत सिखाता है कि अहंकार व्यक्ति की सबसे बड़ी शक्ति को भी उसकी कमजोरी बना सकता है। दशहरे से हमें यह सीखने की जरूरत है कि सच्ची विजय दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार और क्रोध पर जीत हासिल करने में है।

 

रावण का गांव

 

भारत में एक गांव ऐसा भी है जहां दशहरा पर उत्साह नहीं बल्कि शोक मनाया जाता है। ये गांव उत्तरप्रदेश के ग्रेटर नोएडा नें स्थित है जिसका नाम बिसरख है। पौराणिक कथाओं के अनुसार बिसरख गांव का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम पर पड़ा था। गांव का प्राचीन नाम विश्वेशरा था जो बदलकर बिसरख हो गया है। शिवपुराण में भी इस जगह का जिक्र मिलता है और बताया गया है कि ऋषि विश्रवा का यहीं जन्म हुआ था और उन्होंने ही शिवलिंग की स्थापना की थी। दशहरा के मौके पर इस गांव में रावण दहन नहीं होता है लेकिन यज्ञशाला के सामने रावण की मूर्ति रखकर हवन और पूजा की जाती है।

 

:- लता रानी