Sanskar

कौन है तीर्थयात्रा का अधिकारी, किसे मिलता है पूरा फल ?

तीर्थस्थान वो विशेष पवित्र स्थल हैं जिन्हें शास्त्रों में पापनाशक और पुण्यकारक कहा गया है । अर्थात वह यात्रा जो पापनिवृत्ति और पुण्यप्राप्ति के उद्देश्य से विधि पूर्वक की जाती है । तीर्थयात्रा के फल में आध्यात्मिक उन्नति, पापों से मुक्ति, ज्ञान में वृद्धि और मानसिक शांति शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, यह पुरानी संस्कृति और परंपराओं को जानने का अवसर प्रदान करती है और जीवन में एक नई ऊर्जा लाती है। इसमें तीर्थ दर्शन के साथ ही, मुण्डन, स्नान, पूजन, पितरों का पिण्डदान, दान, ब्राह्मण भोजन आदि किया जाना तीर्थकर्म की श्रेणी में आता है और ऐसा करने वाला ही तीर्थयात्री कहलाता है ।

इसीलिए तीर्थ यात्रा और पर्यटन में अंतर होता है। जब किसी आकर्षक स्थान को मनरंजन के लिए देखने के उद्देश्य से वहां घूमने-फिरने और आनंद लेने के उद्देश्य से जाते तो वो पर्यटन का परिचायक होता है। पर्यटन के लिए किसी विशेष धार्मिक नियम की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि पर्यटन का उद्देश्य पाप निवृत्ति व पुण्य प्राप्ति नहीं आनंद प्राप्ति, मनोरंजन, छुट्टी बिताना आदि होता है। हालांकि हाल के वर्षों में इसमें घालमेल होने लगा है । अक्सर लोग पहाड़ में बसे रमणीक तीर्थस्थलो में पर्यटन यानी घूमने-फिरने और मौज-मस्ती के लिए पहुंच जाते हैं जिससे उस स्थान की गरिमा प्रभावित होती है । जबकि शास्त्रों में बताये गए तीर्थों की विशेष महत्ता होती है । वायुपुराण के अनुसार....

तीर्थान्यनुसरन्वीरः श्रद्दधानः समाहितः । कृतपापश्च शुद्धचेत किं पुनः शुद्धकर्मकृत् ॥
तिर्यग्योनिं न गच्छेच्च कुदेशे च न जायते । स्वर्गे भवति वै विप्रो मोक्षोपायं च विन्दति ॥

अर्थात, पापात्मा भी श्रद्धा पूर्वक तीर्थाटन करने से शुद्ध हो जाता है फिर जो पहले से शुद्ध हो उसका तो कहना ही क्या ? जो तीर्थाटन में रत रहते हैं उनकी दुर्गति नहीं होती उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और मोक्ष प्राप्ति का उपाय भी है अर्थात मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।)

यहां तक कि तीर्थाटन तीर्थ यात्रा के रूप में ही होना चाहिए, उसमें पर्यटन स्थल नहीं शामिल करने चाहिए । इसलिये सरकारों को भी चाहिये कि तीर्थस्थल का विकास तो करे किन्तु लोगों को ऐसे कार्यों की अनुमति न दे जो वहां किसी प्रकार के अनुचित आचरण की श्रेणी में आता हो । पर्यटन के उद्देश्य से तीर्थक्षेत्र जाना भी ठीक नहीं माना गया है । इसीलिए हमारे धार्मिक ग्रंथों में तो तीर्थयात्रा के नियम तक बताये गए हैं ।

प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो येन केनचित् ।अहंकारविमुक्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥
अकल्पको निरारम्भो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । विमुक्तः सर्वसङ्गैर्यः स तीर्थफलमश्नुते ॥

अर्थात, तीर्थ यात्रा के जो उद्देश्य हैं उसकी सिद्धि के लिए व्यक्ति को प्रतिग्रह से मुक्त अर्थात यथा प्राप्त से संतुष्ट रहने वाला होना चाहिये, अहंकार और दम्भ से रहित होना चाहिये, निरारम्भ अर्थात अर्थोपार्जन के उपायों से विरत (सेवानिवृत्त) हो, अल्पहारी हो, इन्द्रियों को वश में रखता हो, विमुक्त हो अर्थात सांसारिक सुख-भोग-वस्तु आदि के मोह से बंधा न हो, शास्त्रोक्त कर्मों से विरत न हो वही तीर्थ यात्रा का अधिकारी होता है अर्थात फल प्राप्त कर सकता है।

सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रह:।।
सर्वभूतदया तीर्थं तीर्थमार्जवमेव च।
दान तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमेव च।।
ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं नियमस्तीर्थमुच्यते।
मन्त्राणां तु जपस्तीर्थं तीर्थं तु प्रियवादिता।।
ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थमहिंसा तीर्थमेव च।
आत्मतीर्थं ध्यानतीर्थं पुनस्तीर्थं शिवस्मृति:।।

अर्थात्—सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियनिग्रह तीर्थ है, सभी प्राणियों पर दया करना, सरलता, दान, मनोनिग्रह, संतोष, ब्रह्मचर्य, नियम, मन्त्रजप, मीठा बोलना, ज्ञान, धैर्य, अहिंसा, आत्मा में स्थित रहना, भगवान का ध्यान और भगवान शिव का स्मरण—ये सभी मानसिक तीर्थ कहलाते हैं।

शरीर और मन की शुद्धि, यज्ञ, तपस्या और शास्त्रों का ज्ञान ये सब-के-सब तीर्थ ही हैं। जिस मनुष्य ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया, वह जहां भी रहेगा, वही स्थान उसके लिए नैमिष्यारण, कुरुक्षेत्र, पुष्कर आदि तीर्थ बन जाएंगे।

जो आसक्त हो, नीच कर्मरत हो, क्रूर हो, दम्भ रखता हो, विषय-भोग में लीन हो वो सभी तीर्थों में स्नान करके भी पापी ही रहता है। मात्र शरीर के मलापकर्षण से मनुष्य निर्मल नहीं होता बल्कि निर्मल तब होता है जब मन के मलों का भी त्याग करे। जिसका मन निर्मल न हुआ हो वह अनेकों तीर्थों में स्नान करने से भी स्वर्ग का अधिकारी नहीं होता । तीर्थयात्रा के दौरान सत्य बोलना और अच्छे कर्म करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि तीर्थक्षेत्र में किए गए पाप नष्ट नहीं होते।

 

विजय शर्मा

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कौन है तीर्थयात्रा का अधिकारी, किसे मिलता है पूरा फल ?

तीर्थस्थान वो विशेष पवित्र स्थल हैं जिन्हें शास्त्रों में पापनाशक और पुण्यकारक कहा गया है । अर्थात वह यात्रा जो पापनिवृत्ति और पुण्यप्राप्ति के उद्देश्य से विधि पूर्वक की जाती है । तीर्थयात्रा के फल में आध्यात्मिक उन्नति, पापों से मुक्ति, ज्ञान में वृद्धि और मानसिक शांति शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, यह पुरानी संस्कृति और परंपराओं को जानने का अवसर प्रदान करती है और जीवन में एक नई ऊर्जा लाती है। इसमें तीर्थ दर्शन के साथ ही, मुण्डन, स्नान, पूजन, पितरों का पिण्डदान, दान, ब्राह्मण भोजन आदि किया जाना तीर्थकर्म की श्रेणी में आता है और ऐसा करने वाला ही तीर्थयात्री कहलाता है ।

इसीलिए तीर्थ यात्रा और पर्यटन में अंतर होता है। जब किसी आकर्षक स्थान को मनरंजन के लिए देखने के उद्देश्य से वहां घूमने-फिरने और आनंद लेने के उद्देश्य से जाते तो वो पर्यटन का परिचायक होता है। पर्यटन के लिए किसी विशेष धार्मिक नियम की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि पर्यटन का उद्देश्य पाप निवृत्ति व पुण्य प्राप्ति नहीं आनंद प्राप्ति, मनोरंजन, छुट्टी बिताना आदि होता है। हालांकि हाल के वर्षों में इसमें घालमेल होने लगा है । अक्सर लोग पहाड़ में बसे रमणीक तीर्थस्थलो में पर्यटन यानी घूमने-फिरने और मौज-मस्ती के लिए पहुंच जाते हैं जिससे उस स्थान की गरिमा प्रभावित होती है । जबकि शास्त्रों में बताये गए तीर्थों की विशेष महत्ता होती है । वायुपुराण के अनुसार....

तीर्थान्यनुसरन्वीरः श्रद्दधानः समाहितः । कृतपापश्च शुद्धचेत किं पुनः शुद्धकर्मकृत् ॥
तिर्यग्योनिं न गच्छेच्च कुदेशे च न जायते । स्वर्गे भवति वै विप्रो मोक्षोपायं च विन्दति ॥

अर्थात, पापात्मा भी श्रद्धा पूर्वक तीर्थाटन करने से शुद्ध हो जाता है फिर जो पहले से शुद्ध हो उसका तो कहना ही क्या ? जो तीर्थाटन में रत रहते हैं उनकी दुर्गति नहीं होती उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और मोक्ष प्राप्ति का उपाय भी है अर्थात मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।)

यहां तक कि तीर्थाटन तीर्थ यात्रा के रूप में ही होना चाहिए, उसमें पर्यटन स्थल नहीं शामिल करने चाहिए । इसलिये सरकारों को भी चाहिये कि तीर्थस्थल का विकास तो करे किन्तु लोगों को ऐसे कार्यों की अनुमति न दे जो वहां किसी प्रकार के अनुचित आचरण की श्रेणी में आता हो । पर्यटन के उद्देश्य से तीर्थक्षेत्र जाना भी ठीक नहीं माना गया है । इसीलिए हमारे धार्मिक ग्रंथों में तो तीर्थयात्रा के नियम तक बताये गए हैं ।

प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो येन केनचित् ।अहंकारविमुक्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥
अकल्पको निरारम्भो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । विमुक्तः सर्वसङ्गैर्यः स तीर्थफलमश्नुते ॥

अर्थात, तीर्थ यात्रा के जो उद्देश्य हैं उसकी सिद्धि के लिए व्यक्ति को प्रतिग्रह से मुक्त अर्थात यथा प्राप्त से संतुष्ट रहने वाला होना चाहिये, अहंकार और दम्भ से रहित होना चाहिये, निरारम्भ अर्थात अर्थोपार्जन के उपायों से विरत (सेवानिवृत्त) हो, अल्पहारी हो, इन्द्रियों को वश में रखता हो, विमुक्त हो अर्थात सांसारिक सुख-भोग-वस्तु आदि के मोह से बंधा न हो, शास्त्रोक्त कर्मों से विरत न हो वही तीर्थ यात्रा का अधिकारी होता है अर्थात फल प्राप्त कर सकता है।

सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रह:।।
सर्वभूतदया तीर्थं तीर्थमार्जवमेव च।
दान तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमेव च।।
ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं नियमस्तीर्थमुच्यते।
मन्त्राणां तु जपस्तीर्थं तीर्थं तु प्रियवादिता।।
ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थमहिंसा तीर्थमेव च।
आत्मतीर्थं ध्यानतीर्थं पुनस्तीर्थं शिवस्मृति:।।

अर्थात्—सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियनिग्रह तीर्थ है, सभी प्राणियों पर दया करना, सरलता, दान, मनोनिग्रह, संतोष, ब्रह्मचर्य, नियम, मन्त्रजप, मीठा बोलना, ज्ञान, धैर्य, अहिंसा, आत्मा में स्थित रहना, भगवान का ध्यान और भगवान शिव का स्मरण—ये सभी मानसिक तीर्थ कहलाते हैं।

शरीर और मन की शुद्धि, यज्ञ, तपस्या और शास्त्रों का ज्ञान ये सब-के-सब तीर्थ ही हैं। जिस मनुष्य ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया, वह जहां भी रहेगा, वही स्थान उसके लिए नैमिष्यारण, कुरुक्षेत्र, पुष्कर आदि तीर्थ बन जाएंगे।

जो आसक्त हो, नीच कर्मरत हो, क्रूर हो, दम्भ रखता हो, विषय-भोग में लीन हो वो सभी तीर्थों में स्नान करके भी पापी ही रहता है। मात्र शरीर के मलापकर्षण से मनुष्य निर्मल नहीं होता बल्कि निर्मल तब होता है जब मन के मलों का भी त्याग करे। जिसका मन निर्मल न हुआ हो वह अनेकों तीर्थों में स्नान करने से भी स्वर्ग का अधिकारी नहीं होता । तीर्थयात्रा के दौरान सत्य बोलना और अच्छे कर्म करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि तीर्थक्षेत्र में किए गए पाप नष्ट नहीं होते।

 

विजय शर्मा