3 जनवरी को शांकभरी पूर्णिमा, जानिये माता की महिमा !
सनातन धर्म में मां दुर्गा के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है और इन्हीं में से एक हैं मां शाकंभरी देवी, जिन्हें अन्न, शाक और जीवनदायिनी शक्ति की देवी माना जाता है। शाकम्भरी में "शाक" का अर्थ है – भोज्य शाक-सब्जियाँ व वनस्पतियाँ, जबकि "अम्भर" का अर्थ है - वस्त्र। यानी वह देवी जो वनस्पति और अन्नादि धारण करती हैं एवं उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं । मां शाकंभरी का स्वरूप करुणा, संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक है। उनका स्मरण करते ही अकाल से मुक्ति, भोज्य पदार्थों की प्राप्ति और जीवन में सुख-शांति जागृत होती है।
हिंदू धर्म के पावन पर्वों में से एक है ‘शाकंभरी पूर्णिमा’, जिसे ‘शाकंभरी जयंती’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हर वर्ष पौष माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु ‘देवी शाकंभरी’ की पूजा-अर्चना करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और जीवन में खान-पान का सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं। इस बार शाकंभरी जयंती 3 जनवरी, शनिवार को मनाई जाएगी ।
कैसे हुआ मां शाकंभरी का अवतरण
मां शाकुंभरी देवी का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती, पद्म पुराण और कनकधारा स्तोत्र जैसे पवित्र ग्रंथों में मिलता है। मां भगवती का शाकुंभरी नाम कैसे पड़ा, इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भी है।
प्राचीन समय में दुर्ग नाम के एक दैत्य ने सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके वरदान में चारों वेद प्राप्त कर लिए। जब वेद दैत्यों के पास चले गए, तो सभी वैदिक कर्म और पूजा-पाठ बंद हो गए। इसके कारण देवताओं की शक्ति कम होने लगी । यहां तक कि लगातार 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। इससे तीनों लोकों में भयंकर अकाल पड़ गया। धरती सूख गई, नदियाँ और तालाब खाली हो गए, वनस्पतियां समाप्त होने लगीं और सभी जीव-जंतु बहुत दुखी हो गए। इस संकट से बचने के लिए देवताओं ने शिवालिक पर्वत की पहली चोटी पर मां जगदम्बा की घोर तपस्या की। देवताओं की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती प्रकट हुईं। देवताओं ने उनसे अकाल दूर करने की प्रार्थना की। देवताओं की पीड़ा देखकर मां को दया आई। तब मां ने अपने सौ नेत्रों से नौ दिन और नौ रात तक अश्रु बरसाए। इन अश्रुओं से धरती हरी-भरी हो गई, नदियाँ और समुद्र जल से भर गए । सभी देवता माँ का शताक्षी (सौ नेत्रों वाली) नाम से उद्घोष करने लगे और गुप्त नवरात्रि की परंपरा शुरू हुई। आपको बता दें कि इस वर्ष 19 से 27 जनवरी के बीच गुप्त नवरात्रि भी मनाई जाएगी। खैर, इसके बाद मां भगवती ने सबकी भूख मिटाने के लिए पर्वतों और धरती पर शाक और फल उत्पन्न किए। इसी कारण मां का नाम शाकुंभरी देवी पड़ा।
श्री दुर्गा सप्तशती में उल्लेख
श्री दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में मां शाकुंभरी देवी का वर्णन मिलता है। मां दुर्गा ने देवताओं से कहा कि “ मैं अपने शरीर से उत्पन्न हुए प्राणों की रक्षा करने वाले शाकों (शाक भाजी) द्वारा सभी प्राणियों का पालन करुंगी और तब इस पृथ्वी पर शाकुंभरी के नाम से विख्यात होऊंगी। इस अवतार में मैं दुर्ग नामक महाअसुर का वध करुंगी और दुर्गा देवी के नाम से प्रसिद्ध होऊंगी।“
माता शाकंभरी के प्रमुख मंदिर
पहला स्थान राजस्थान में सांभर जिले के समीप 'शाकंभर' के नाम से स्थित है। शाकंभरी माता सांभर क्षेत्र की स्थानीय देवी हैं तथा चौहान राजवंश की कुलदेवी हैं । शाकंभरी माता का यह प्रसिद्ध मंदिर सांभर से लगभग 15 किमी की दूरी पर है। यहां की सांभर झील भी शाकंभरी देवी के नाम पर प्रसिद्ध है।
मां शाकंभरी का दूसरा प्रमुख मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में उदयपुर वाटी के पास सकराय माताजी के नाम से स्थित है। यह स्थान सकराय मां के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडव अपने भाइयों व परिजनों का युद्ध में वध (गोत्र हत्या) के पाप से मुक्ति पाने के लिए अरावली की पहाड़ियों में रुके थे। युधिष्ठिर ने पूजा-अर्चना के लिए देवी मां शर्करा की स्थापना की थी, वहीं अब शाकंभरी तीर्थ है।
मां शाकंभरी का तीसरा स्थान उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है। इस मंदिर में शाकंभरी देवी, भीमा देवी, भ्रामरी देवी व शताक्षी देवी भी प्रतिष्ठित हैं। शाकंभरी देवी मंदिर, शिवालिक पहाड़ियों में स्थित एक प्रमुख सिद्धपीठ है, जिसे माता दुर्गा का रूप माना जाता है, जो भक्तों को प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। यह स्थान हर साल नवरात्रि और दीपावली जैसे त्योहारों पर लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जहाँ वे माँ शाकंभरी के दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं।
अन्न, शाक-फल और जीवन की देवी मां शाकंभरी देवी करुणा, दया और समृद्धि की साक्षात् स्वरूपा हैं। जब-जब सृष्टि पर संकट आया, तब-तब मां ने अपनी ममता से जगत का पालन किया और मानव जीवन को नवसंजीवनी प्रदान की। शाकंभरी पूर्णिमा के पावन अवसर पर मां के चरणों में श्रद्धा अर्पित कर यह प्रार्थना करें कि वे हमारे जीवन से भी अभाव, अकाल और दुख दूर करें तथा अन्न, स्वास्थ्य, सुख और शांति से हमारे घर-परिवार को परिपूर्ण करें।
3 जनवरी को शांकभरी पूर्णिमा, जानिये माता की महिमा !
सनातन धर्म में मां दुर्गा के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है और इन्हीं में से एक हैं मां शाकंभरी देवी, जिन्हें अन्न, शाक और जीवनदायिनी शक्ति की देवी माना जाता है। शाकम्भरी में "शाक" का अर्थ है – भोज्य शाक-सब्जियाँ व वनस्पतियाँ, जबकि "अम्भर" का अर्थ है - वस्त्र। यानी वह देवी जो वनस्पति और अन्नादि धारण करती हैं एवं उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं । मां शाकंभरी का स्वरूप करुणा, संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक है। उनका स्मरण करते ही अकाल से मुक्ति, भोज्य पदार्थों की प्राप्ति और जीवन में सुख-शांति जागृत होती है।
हिंदू धर्म के पावन पर्वों में से एक है ‘शाकंभरी पूर्णिमा’, जिसे ‘शाकंभरी जयंती’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हर वर्ष पौष माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु ‘देवी शाकंभरी’ की पूजा-अर्चना करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और जीवन में खान-पान का सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं। इस बार शाकंभरी जयंती 3 जनवरी, शनिवार को मनाई जाएगी ।
कैसे हुआ मां शाकंभरी का अवतरण
मां शाकुंभरी देवी का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती, पद्म पुराण और कनकधारा स्तोत्र जैसे पवित्र ग्रंथों में मिलता है। मां भगवती का शाकुंभरी नाम कैसे पड़ा, इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भी है।
प्राचीन समय में दुर्ग नाम के एक दैत्य ने सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके वरदान में चारों वेद प्राप्त कर लिए। जब वेद दैत्यों के पास चले गए, तो सभी वैदिक कर्म और पूजा-पाठ बंद हो गए। इसके कारण देवताओं की शक्ति कम होने लगी । यहां तक कि लगातार 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। इससे तीनों लोकों में भयंकर अकाल पड़ गया। धरती सूख गई, नदियाँ और तालाब खाली हो गए, वनस्पतियां समाप्त होने लगीं और सभी जीव-जंतु बहुत दुखी हो गए। इस संकट से बचने के लिए देवताओं ने शिवालिक पर्वत की पहली चोटी पर मां जगदम्बा की घोर तपस्या की। देवताओं की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती प्रकट हुईं। देवताओं ने उनसे अकाल दूर करने की प्रार्थना की। देवताओं की पीड़ा देखकर मां को दया आई। तब मां ने अपने सौ नेत्रों से नौ दिन और नौ रात तक अश्रु बरसाए। इन अश्रुओं से धरती हरी-भरी हो गई, नदियाँ और समुद्र जल से भर गए । सभी देवता माँ का शताक्षी (सौ नेत्रों वाली) नाम से उद्घोष करने लगे और गुप्त नवरात्रि की परंपरा शुरू हुई। आपको बता दें कि इस वर्ष 19 से 27 जनवरी के बीच गुप्त नवरात्रि भी मनाई जाएगी। खैर, इसके बाद मां भगवती ने सबकी भूख मिटाने के लिए पर्वतों और धरती पर शाक और फल उत्पन्न किए। इसी कारण मां का नाम शाकुंभरी देवी पड़ा।
श्री दुर्गा सप्तशती में उल्लेख
श्री दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में मां शाकुंभरी देवी का वर्णन मिलता है। मां दुर्गा ने देवताओं से कहा कि “ मैं अपने शरीर से उत्पन्न हुए प्राणों की रक्षा करने वाले शाकों (शाक भाजी) द्वारा सभी प्राणियों का पालन करुंगी और तब इस पृथ्वी पर शाकुंभरी के नाम से विख्यात होऊंगी। इस अवतार में मैं दुर्ग नामक महाअसुर का वध करुंगी और दुर्गा देवी के नाम से प्रसिद्ध होऊंगी।“
माता शाकंभरी के प्रमुख मंदिर
पहला स्थान राजस्थान में सांभर जिले के समीप 'शाकंभर' के नाम से स्थित है। शाकंभरी माता सांभर क्षेत्र की स्थानीय देवी हैं तथा चौहान राजवंश की कुलदेवी हैं । शाकंभरी माता का यह प्रसिद्ध मंदिर सांभर से लगभग 15 किमी की दूरी पर है। यहां की सांभर झील भी शाकंभरी देवी के नाम पर प्रसिद्ध है।
मां शाकंभरी का दूसरा प्रमुख मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में उदयपुर वाटी के पास सकराय माताजी के नाम से स्थित है। यह स्थान सकराय मां के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडव अपने भाइयों व परिजनों का युद्ध में वध (गोत्र हत्या) के पाप से मुक्ति पाने के लिए अरावली की पहाड़ियों में रुके थे। युधिष्ठिर ने पूजा-अर्चना के लिए देवी मां शर्करा की स्थापना की थी, वहीं अब शाकंभरी तीर्थ है।
मां शाकंभरी का तीसरा स्थान उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है। इस मंदिर में शाकंभरी देवी, भीमा देवी, भ्रामरी देवी व शताक्षी देवी भी प्रतिष्ठित हैं। शाकंभरी देवी मंदिर, शिवालिक पहाड़ियों में स्थित एक प्रमुख सिद्धपीठ है, जिसे माता दुर्गा का रूप माना जाता है, जो भक्तों को प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। यह स्थान हर साल नवरात्रि और दीपावली जैसे त्योहारों पर लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जहाँ वे माँ शाकंभरी के दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं।
अन्न, शाक-फल और जीवन की देवी मां शाकंभरी देवी करुणा, दया और समृद्धि की साक्षात् स्वरूपा हैं। जब-जब सृष्टि पर संकट आया, तब-तब मां ने अपनी ममता से जगत का पालन किया और मानव जीवन को नवसंजीवनी प्रदान की। शाकंभरी पूर्णिमा के पावन अवसर पर मां के चरणों में श्रद्धा अर्पित कर यह प्रार्थना करें कि वे हमारे जीवन से भी अभाव, अकाल और दुख दूर करें तथा अन्न, स्वास्थ्य, सुख और शांति से हमारे घर-परिवार को परिपूर्ण करें।