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बिहार के गया नगर में, विष्णुपद मंदिर के ठीक सामने और फल्गु नदी के दूसरे किनारे स्थित सीता कुण्ड एक अत्यंत पवित्र और आस्था से जुड़ा हुआ स्थल है। यह स्थान केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक विश्वासों की एक अनमोल धरोहर है। प्राचीन काल से ही यह स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है और इसका संबंध रामायण काल से जुड़ी पवित्र कथाओं से माना जाता है।
सीता कुण्ड मंदिर माता सीता की पवित्र उपस्थिति का प्रतीक है। यहाँ माता सीता की प्रतिमा के साथ राजा दशरथ का पिंड धारण किए हुए हाथ की आकृति स्थापित है। मान्यता है कि माता सीता ने यहीं अपने ससुर राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। शेष दो पिंड पास की बालू में रखे गए हैं, जो इस स्थान की विशेष धार्मिक परंपरा को दर्शाते हैं।
सीता कुण्ड का पवित्र जल हिंदू पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि वनवास के समय माता सीता भगवान राम और लक्ष्मण के साथ यहाँ आई थीं और इसी कुंड के जल से उन्होंने आत्मशुद्धि का पवित्र कार्य किया था। आज भी यह साधारण दिखने वाला मंदिर उन पवित्र कथाओं का मौन साक्षी बनकर खड़ा है और यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को श्रद्धा, शांति और आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
सीता कुंड की पौराणिक कथा
मान्यता है कि इसी पवित्र स्थान पर माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था। अपने वननासकाल में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी पिता दशरथ का पिंडदान करने के लिए गया गए थे। उस समय जिस क्षेत्र में आज सीता कुंड स्थित है, वह एक जंगल था। भगवान राम पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री लाने हेतु फल्गु नदी के पार गए लेकिन आने में देरी के कारण समय बीतता जा रहा था और सूर्य अस्त होने वाला था। तभी अचानक राजा दशरथ ने आकाश से माता सीता से पिंडदान करने का अनुरोध किया। यह सुनकर माता सीता ने जिज्ञासा प्रकट की कि पति की अनुपस्थिति में वे पिंडदान कैसे कर सकती हैं ?
गरुण पुराण के अनुसार राजा दशरथ ने कहा कि महिलाएं भी पुरुषों की तरह पिंडदान कर सकती हैं। माता सीता बड़े संशय में पड़ गईं क्योंकि उनके पास ससुर जी को अर्पित करने के लिए कुछ नहीं था । तब उन्होंने सीता जी से कहा कि वो नदी की रेत का गोला बनाकर ही पिंड के रूप में अर्पित कर दें। यह सुनते ही सीता जी ने फल्गु नदी, वटवृक्ष, ब्राह्मण, केतकी के फूल और गौमाता को साक्षी मानते हुए रेत से पिंड बनाए और राजा दशरथ का पिंडदान किया। दशरथ जी ने दो हाथ प्रकट किये और माता सीता का अर्पण ग्रहण कर लिया।
जब भगवान राम वापस लौटे, तो माता सीता ने उनकी अनुपस्थिति में घटी घटना सुनाते हुए कहा कि उन्होंने राजा दशरथ का पिंडदान कैसे किया था। यह सुनकर श्री राम को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा कि क्या आपको पिंडदान करते हुए किसी ने देखा ? तब सिर्फ वटवृक्ष ने माता सीता की बात की पुष्टि की, लेकिन फल्गु नदी, गाय, ब्राह्मण और केतकी के फूल कुछ नहीं बोले। सीता माता क्रोधित हो गईं और उन्होंने उन्हें श्राप दे दिया । नदी को श्राप दिया कि वह भूमि के नीचे बहने लगेगी और रेतीली हो जाएगी। आज भी फल्गु नदी की वैसी ही हालत है । केतकी के फूल को अभिशप्त कर दिया जिसके कारण उसे किसी भी देवी-देवता की पूजा में अर्पित नहीं किया जाता है। गाय को पूजनीय होकर भी जूठन खाने का श्राप मिला था और ब्राह्मण को कभी न संतुष्ट होने का श्राप दिया। इसी के साथ ही उन्होंने वटवृक्ष से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु होने का वरदान दिया।
सीता कुंड मंदिर में पिंडदान
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान गया में पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है। ऐसा विश्वास है कि पितृपक्ष में पूर्वजों को पृथ्वी लोक में आने और अपने परिजनों से मिलने का अवसर मिलता है। इसलिए उनकी आत्मा की संतुष्टि के लिए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण जैसे कर्म किए जाते हैं।
जब माता सीता ने फल्गु नदी की बालू से पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान किया था, तभी से पितृपक्ष के समय यहां बालू से भी पिंडदान करने की परंपरा चली आ रही है। तीर्थयात्री फल्गु के पावन जल से तर्पण करने के बाद पिंड द्वारा अपने पितरों की मुक्ति के लिए विधिवत कर्मकांड करते हैं।
सीता कुंड के आसपास के आध्यात्मिक स्थान
सीता कुंड की पवित्र भूमि के अलावा, गया और उसके आसपास अनेक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। कुछ ही दूरी पर प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर है, जहाँ एक पवित्र शिला पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न अंकित हैं। यह मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं को पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए आकर्षित करता रहा है।
इसके पास ही ब्रह्म कुंड स्थित है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसके पवित्र जल में स्नान करने से पापों का नाश होता है और आत्मा की शुद्धि होती है। प्रकृति से प्रेम करने वालों के लिए रामशिला पहाड़ी एक शांत और मनमोहक स्थल है। यहाँ की हरियाली, पक्षियों की चहचहाहट और बहती हवा व्यक्ति को ध्यान और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करती है।

