मकर संक्रांति 2026 : आध्यात्मिक महत्व, पूजन विधि व स्नान-दान का शुभ मुहूर्त
हिंदू सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है मकर संक्रांति, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति या खिचड़ी, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल और असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है और वह है सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना। दृग पंचांग के अनुसार सूर्य 14 जनवरी को दोपहर में लगभग 3 बजकर 13 मिनट पर धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे और सूर्य देव उत्तरायण होंगे। इसलिए मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी 2026 बुधवार के दिन मनाया जाएगा।
मकर संक्राति की कथा
सनातन धर्म के अनुसार पंचदेवों में सूर्य पूजा का विधान बताया गया है। अंग्रेजी नववर्ष के अनुसार ये साल का पहला त्योहार माना जाता है, जो सूर्य पूजा का सबसे विशेष व महत्वपूर्ण दिन होता है और ये हिंदी माह के माघ मास में मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार शनि का अपने पिता सूर्य से बैर भाव था। कुछ मतभेदों के कारण आपसी तनाव हो गए तो शनि के भाई यमराज ने अपने पिता सूर्य देव को काफी समझाया। तब सूर्य देव शनि के घर कुंभ राशि में पहुंचे। लेकिन कुंभ राशि में सब कुछ अस्त-व्यस्त था और पिता के स्वागत के लिए शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि को आशीर्वाद दिया कि शनि के दूसरे घर मकर राशि में मेरे आने पर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा। तिल के कारण ही शनि को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था। इसलिए शनि देव को तिल प्रिय है। जिस दिन ये घटना घटित हुई उस दिन माघ मास की संक्रांति थी। उसी समय से मकर संक्राति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का नियम शुरू हुआ। यही कारण है कि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण होते हैं।
मकर संक्राति पर क्या-क्या करें ?
इस दिन ठण्ड होने के कारण गर्म कपड़े और गरम वस्तुओं का दान करना शुभ फलदायी बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण, निर्णय सिंधु और विष्णु पुराण के अनुसार सुबह के समय पीपल के पेड़ में कच्चे दूध में काले तिल मिला कर चढ़ाने से शनि महाराज प्रसन्न होते हैं। जन्म कुंडली में शनि का कुप्रभाव शांत होता है। वहीं दोपहर के 12 बजे यदि आप यह कार्य करते हैं तो पितृ प्रसन्न होते हैं। पितृ लोक में यमराज मृत आत्माओं को सुख प्रदान करते हैं और पितृ आपके जीवन को सुखी होने का आशीर्वाद देते हैं। जिन लोगों को शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही है उन व्यक्तियों को छाता और जूते का दान करना चाहिए। शिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने से रोगों से मुक्ति मिलती है। सवा मुठ्ठी साबुत चावल दोनों हाथ से चढ़ाने से धन में वृद्धि होती है। इस दिन गर्म वस्त्र जरुरतमंदों को देने से शनि और राहु का प्रभाव जन्मकुंडली में से दूर होता है। साथ ही व्यापार और नौकरी में तरक्की होती है। जल में सिंदूर, साबुत चावल, गुड़ और तिल डाल कर अर्घ्य देने से सूर्य देव की कृपा मिलती है। चूंकि सूर्य देव नवग्रहों में प्रमुख और अधिपति हैं तो किसी भी ग्रह का कुप्रभाव आपके ऊपर नहीं होगा। इस दिन गौधूलि बेला में हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं, क्योंकि सूर्य देव हनुमान जी महाराज के गुरु हैं। हनुमान जी के सन्मुख राम नाम का दीप दान करने से और हनुमान चालीसा का पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती हैं। देवी-देवता कृपा करते हैं। इस दिन खिचड़ी का भी दान किया जाता है परन्तु इस दिन षटतिला एकादशी होने पर चावल और दाल का दान करना निषेध है। इसलिए इस दिन ऋतु फल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, गजक और विशेष रूप से तिल से बनी अन्य वस्तुओं का दान करना उत्तम है।
मकर संक्राति पर स्नान का महत्व
शास्त्रों में मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के दिन पवित्र नदी में स्नान, विशेष रूप से गंगा सागर का स्नान अनंत मंगलकारी बताया गया है । इसलिए कहा जाता है ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।‘ पुराणों में मकर संक्रांति को देवताओं का दिन बताया गया है। इस दिन से जुड़े अनेक पौराणिक तथ्य हैं जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान शिव ने इस दिन भगवान विष्णु को आत्मज्ञान का दान दिया था और देवताओं के दिनों की गणना भी इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब तक दक्षिण में (दक्षिणायन) रहते हैं तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि और उतरायण में देवताओं का छह माह का दिन कहा गया है। यहां तक कि महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था। इसी कारण मकर संक्रांति को दान-पुण्य, स्नान और सत्कर्म का दिन कहा गया है इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस लौटता है।
मकर संक्रांति 2026 : आध्यात्मिक महत्व, पूजन विधि व स्नान-दान का शुभ मुहूर्त
हिंदू सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है मकर संक्रांति, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति या खिचड़ी, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल और असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है और वह है सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना। दृग पंचांग के अनुसार सूर्य 14 जनवरी को दोपहर में लगभग 3 बजकर 13 मिनट पर धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे और सूर्य देव उत्तरायण होंगे। इसलिए मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी 2026 बुधवार के दिन मनाया जाएगा।
मकर संक्राति की कथा
सनातन धर्म के अनुसार पंचदेवों में सूर्य पूजा का विधान बताया गया है। अंग्रेजी नववर्ष के अनुसार ये साल का पहला त्योहार माना जाता है, जो सूर्य पूजा का सबसे विशेष व महत्वपूर्ण दिन होता है और ये हिंदी माह के माघ मास में मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार शनि का अपने पिता सूर्य से बैर भाव था। कुछ मतभेदों के कारण आपसी तनाव हो गए तो शनि के भाई यमराज ने अपने पिता सूर्य देव को काफी समझाया। तब सूर्य देव शनि के घर कुंभ राशि में पहुंचे। लेकिन कुंभ राशि में सब कुछ अस्त-व्यस्त था और पिता के स्वागत के लिए शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि को आशीर्वाद दिया कि शनि के दूसरे घर मकर राशि में मेरे आने पर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा। तिल के कारण ही शनि को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था। इसलिए शनि देव को तिल प्रिय है। जिस दिन ये घटना घटित हुई उस दिन माघ मास की संक्रांति थी। उसी समय से मकर संक्राति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का नियम शुरू हुआ। यही कारण है कि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण होते हैं।
मकर संक्राति पर क्या-क्या करें ?
इस दिन ठण्ड होने के कारण गर्म कपड़े और गरम वस्तुओं का दान करना शुभ फलदायी बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण, निर्णय सिंधु और विष्णु पुराण के अनुसार सुबह के समय पीपल के पेड़ में कच्चे दूध में काले तिल मिला कर चढ़ाने से शनि महाराज प्रसन्न होते हैं। जन्म कुंडली में शनि का कुप्रभाव शांत होता है। वहीं दोपहर के 12 बजे यदि आप यह कार्य करते हैं तो पितृ प्रसन्न होते हैं। पितृ लोक में यमराज मृत आत्माओं को सुख प्रदान करते हैं और पितृ आपके जीवन को सुखी होने का आशीर्वाद देते हैं। जिन लोगों को शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही है उन व्यक्तियों को छाता और जूते का दान करना चाहिए। शिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने से रोगों से मुक्ति मिलती है। सवा मुठ्ठी साबुत चावल दोनों हाथ से चढ़ाने से धन में वृद्धि होती है। इस दिन गर्म वस्त्र जरुरतमंदों को देने से शनि और राहु का प्रभाव जन्मकुंडली में से दूर होता है। साथ ही व्यापार और नौकरी में तरक्की होती है। जल में सिंदूर, साबुत चावल, गुड़ और तिल डाल कर अर्घ्य देने से सूर्य देव की कृपा मिलती है। चूंकि सूर्य देव नवग्रहों में प्रमुख और अधिपति हैं तो किसी भी ग्रह का कुप्रभाव आपके ऊपर नहीं होगा। इस दिन गौधूलि बेला में हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं, क्योंकि सूर्य देव हनुमान जी महाराज के गुरु हैं। हनुमान जी के सन्मुख राम नाम का दीप दान करने से और हनुमान चालीसा का पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती हैं। देवी-देवता कृपा करते हैं। इस दिन खिचड़ी का भी दान किया जाता है परन्तु इस दिन षटतिला एकादशी होने पर चावल और दाल का दान करना निषेध है। इसलिए इस दिन ऋतु फल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, गजक और विशेष रूप से तिल से बनी अन्य वस्तुओं का दान करना उत्तम है।
मकर संक्राति पर स्नान का महत्व
शास्त्रों में मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के दिन पवित्र नदी में स्नान, विशेष रूप से गंगा सागर का स्नान अनंत मंगलकारी बताया गया है । इसलिए कहा जाता है ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।‘ पुराणों में मकर संक्रांति को देवताओं का दिन बताया गया है। इस दिन से जुड़े अनेक पौराणिक तथ्य हैं जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान शिव ने इस दिन भगवान विष्णु को आत्मज्ञान का दान दिया था और देवताओं के दिनों की गणना भी इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब तक दक्षिण में (दक्षिणायन) रहते हैं तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि और उतरायण में देवताओं का छह माह का दिन कहा गया है। यहां तक कि महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था। इसी कारण मकर संक्रांति को दान-पुण्य, स्नान और सत्कर्म का दिन कहा गया है इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस लौटता है।