Sanskar

श्रृंगेरी शारदम्बा मंदिर : भक्ति और आस्था का संगम

 

कर्नाटक राज्य के चिकमंगलूर ज़िले में तुंगा नदी के पावन तट पर लगभग 1100 वर्ष पुराना श्रृंगेरी का शारदम्बा मंदिर स्थित है। यह प्रसिद्ध मंदिर विद्या की देवी सरस्वती के स्वरूप देवी शारदम्बा को समर्पित है। यहाँ वसंत पंचमी के पर्व पर बहुत रौनक होती है । इस दिन विशेष पूजा-अर्चना होती है जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु हिस्सा लेने के लिए आते हैं।

 

इस मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में संत आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्थान ज्ञान, शिक्षा और आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। मंदिर के कपाट प्रतिदिन प्रातः 6:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक भक्तों के दर्शन के लिए खुले रहते हैं।

 

प्रारंभ में इस मंदिर में देवी शारदम्बा की मूर्ति चंदन की लकड़ी से बनी हुई थी, जिसे स्वयं आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। बाद में 14वीं शताब्दी में उस मूर्ति के स्थान पर स्वर्ण (सोने) की मूर्ति स्थापित की गई।

 

मंदिर की महिमा :  

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने श्री आदि शंकराचार्य को एक स्फटिक से बना चंद्रमौलेश्वर लिंग भेंट किया था। आज भी इस पवित्र लिंग के दर्शन किए जा सकते हैं। प्रतिदिन रात्रि 8:30 बजे चंद्रमौलेश्वर की विशेष पूजा की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि विद्या की देवी सरस्वती का अवतार देवी शारदाम्बिका के रूप में हुआ, जिन्होंने उपाय भारती के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। यह एक प्रचलित मान्यता है कि देवी की पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के साथ-साथ माता दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

मंदिर के अनुष्ठान :

 

अर्चना - अष्टोत्रम, त्रिशती, सहस्रनाम, लक्षार्चन

दुर्गा शत चंडी

दिंडी दीपाराधना

उदयस्तमन पूजा

सुप्रभात सेवा

स्वर्ण पुष्प सेवा

अक्षराभ्यास

सरस्वती पूजा

 

क्या है अक्षराभ्यास अनुष्ठान ?

 

श्रृंगेरी शारदम्बा मंदिर में होने वाला ‘अक्षरभ्यास संस्कार’ अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। इस अनुष्ठान के माध्यम से बच्चों के जीवन में विद्या का शुभ आरंभ किया जाता है और देवी की कृपा प्राप्त करने की कामना की जाती है। यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने छोटे बच्चों का अक्षराभ्यास संस्कार कराने के लिए आते हैं। आमतौर पर 2 से 5 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता को एक स्लेट और चॉक या चावल से भरी एक थाली दी जाती है। इसके माध्यम से वे देवी सरस्वती और गुरु से प्रार्थना करते हैं कि उनके बच्चों को अच्छा ज्ञान, बुद्धि और श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त हो।

 

मंदिर में विराजमान देवी-देवता :

 

गणपति जी : विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता

 

गणपति जी को सभी बाधाओं को दूर करने वाले और ज्ञान व बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनसे की जाती है। उनका विशाल मुख, सौम्य रूप और करुणामय स्वभाव भक्तों को सही मार्ग दिखाता है और जीवन में सफलता व विवेक प्रदान करता है।

 

देवी शारदम्बा : ज्ञान और विद्या की देवी (मुख्य देवी)

 

देवी शारदम्बा श्रृंगेरी शारदा पीठम की मुख्य और अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हें ज्ञान, विद्या और बुद्धि की देवी सरस्वती का स्वरूप माना जाता है । उनके दर्शन से भक्तों को विद्या, बुद्धि और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है। श्रृंगेरी में देवी शारदाम्बा की उपस्थिति ज्ञान की निरंतर खोज और सृष्टि का पोषण करने वाली दिव्य स्त्री शक्ति का जीवंत प्रमाण मानी जाती है।

 

भगवान विष्णु / श्रीनिवास (वेंकटेश्वर) :

 

श्रीनिवास जी, जिन्हें वेंकटेश्वर भी कहा जाता है, भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वे धन, समृद्धि और मोक्ष के प्रतीक हैं। मान्यता है कि वे तिरुमाला की पवित्र पहाड़ियों पर विराजमान हैं और अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं।

 

श्रीराम (कोदंड राम) : सीता, लक्ष्मण और हनुमान सहित

 

कोदंड राम भगवान श्रीराम का वह स्वरूप है जिसमें वे धनुष धारण किए हुए हैं। यह रूप धर्म, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी के साथ उनकी प्रतिमा भक्तों के हृदय में भक्ति, मर्यादा और धर्म के प्रति निष्ठा की भावना जाग्रत करती है।

 

महादेव :

 

भगवान शिव सृष्टि, पालन और संहार के चक्र के प्रतीक माने जाते हैं। वे ध्यान, तप और कला के संरक्षक हैं। उनका शांत स्वरूप और दिव्य नृत्य, साधकों को आत्मज्ञान, आंतरिक शांति और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

 

मुरुगन (कार्तिकेय / स्कंद / सुब्रमण्य) :

 

मुरुगन, जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद या सुब्रमण्य भी कहा जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती के वीर पुत्र हैं। वे युद्ध और ज्ञान के देवता माने जाते हैं। उन्हें भाला धारण किए और मोर पर सवार दिखाया जाता है, जो अहंकार के नाश का प्रतीक है। दक्षिण भारत और श्रीलंका में मुरुगन अत्यंत प्रिय हैं। वे धर्म के रक्षक और देवताओं की सेना के सेनापति हैं। राक्षस सुरपद्मन पर उनकी विजय की कथा स्कंद षष्ठी के रूप में मनाई जाती है।

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव

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कर्नाटक राज्य के चिकमंगलूर ज़िले में तुंगा नदी के पावन तट पर लगभग 1100 वर्ष पुराना श्रृंगेरी का शारदम्बा मंदिर स्थित है। यह प्रसिद्ध मंदिर विद्या की देवी सरस्वती के स्वरूप देवी शारदम्बा को समर्पित है। यहाँ वसंत पंचमी के पर्व पर बहुत रौनक होती है । इस दिन विशेष पूजा-अर्चना होती है जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु हिस्सा लेने के लिए आते हैं।

 

इस मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में संत आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्थान ज्ञान, शिक्षा और आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। मंदिर के कपाट प्रतिदिन प्रातः 6:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक भक्तों के दर्शन के लिए खुले रहते हैं।

 

प्रारंभ में इस मंदिर में देवी शारदम्बा की मूर्ति चंदन की लकड़ी से बनी हुई थी, जिसे स्वयं आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। बाद में 14वीं शताब्दी में उस मूर्ति के स्थान पर स्वर्ण (सोने) की मूर्ति स्थापित की गई।

 

मंदिर की महिमा :  

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने श्री आदि शंकराचार्य को एक स्फटिक से बना चंद्रमौलेश्वर लिंग भेंट किया था। आज भी इस पवित्र लिंग के दर्शन किए जा सकते हैं। प्रतिदिन रात्रि 8:30 बजे चंद्रमौलेश्वर की विशेष पूजा की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि विद्या की देवी सरस्वती का अवतार देवी शारदाम्बिका के रूप में हुआ, जिन्होंने उपाय भारती के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। यह एक प्रचलित मान्यता है कि देवी की पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के साथ-साथ माता दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

मंदिर के अनुष्ठान :

 

अर्चना - अष्टोत्रम, त्रिशती, सहस्रनाम, लक्षार्चन

दुर्गा शत चंडी

दिंडी दीपाराधना

उदयस्तमन पूजा

सुप्रभात सेवा

स्वर्ण पुष्प सेवा

अक्षराभ्यास

सरस्वती पूजा

 

क्या है अक्षराभ्यास अनुष्ठान ?

 

श्रृंगेरी शारदम्बा मंदिर में होने वाला ‘अक्षरभ्यास संस्कार’ अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। इस अनुष्ठान के माध्यम से बच्चों के जीवन में विद्या का शुभ आरंभ किया जाता है और देवी की कृपा प्राप्त करने की कामना की जाती है। यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने छोटे बच्चों का अक्षराभ्यास संस्कार कराने के लिए आते हैं। आमतौर पर 2 से 5 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता को एक स्लेट और चॉक या चावल से भरी एक थाली दी जाती है। इसके माध्यम से वे देवी सरस्वती और गुरु से प्रार्थना करते हैं कि उनके बच्चों को अच्छा ज्ञान, बुद्धि और श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त हो।

 

मंदिर में विराजमान देवी-देवता :

 

गणपति जी : विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता

 

गणपति जी को सभी बाधाओं को दूर करने वाले और ज्ञान व बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनसे की जाती है। उनका विशाल मुख, सौम्य रूप और करुणामय स्वभाव भक्तों को सही मार्ग दिखाता है और जीवन में सफलता व विवेक प्रदान करता है।

 

देवी शारदम्बा : ज्ञान और विद्या की देवी (मुख्य देवी)

 

देवी शारदम्बा श्रृंगेरी शारदा पीठम की मुख्य और अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हें ज्ञान, विद्या और बुद्धि की देवी सरस्वती का स्वरूप माना जाता है । उनके दर्शन से भक्तों को विद्या, बुद्धि और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है। श्रृंगेरी में देवी शारदाम्बा की उपस्थिति ज्ञान की निरंतर खोज और सृष्टि का पोषण करने वाली दिव्य स्त्री शक्ति का जीवंत प्रमाण मानी जाती है।

 

भगवान विष्णु / श्रीनिवास (वेंकटेश्वर) :

 

श्रीनिवास जी, जिन्हें वेंकटेश्वर भी कहा जाता है, भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वे धन, समृद्धि और मोक्ष के प्रतीक हैं। मान्यता है कि वे तिरुमाला की पवित्र पहाड़ियों पर विराजमान हैं और अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं।

 

श्रीराम (कोदंड राम) : सीता, लक्ष्मण और हनुमान सहित

 

कोदंड राम भगवान श्रीराम का वह स्वरूप है जिसमें वे धनुष धारण किए हुए हैं। यह रूप धर्म, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी के साथ उनकी प्रतिमा भक्तों के हृदय में भक्ति, मर्यादा और धर्म के प्रति निष्ठा की भावना जाग्रत करती है।

 

महादेव :

 

भगवान शिव सृष्टि, पालन और संहार के चक्र के प्रतीक माने जाते हैं। वे ध्यान, तप और कला के संरक्षक हैं। उनका शांत स्वरूप और दिव्य नृत्य, साधकों को आत्मज्ञान, आंतरिक शांति और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

 

मुरुगन (कार्तिकेय / स्कंद / सुब्रमण्य) :

 

मुरुगन, जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद या सुब्रमण्य भी कहा जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती के वीर पुत्र हैं। वे युद्ध और ज्ञान के देवता माने जाते हैं। उन्हें भाला धारण किए और मोर पर सवार दिखाया जाता है, जो अहंकार के नाश का प्रतीक है। दक्षिण भारत और श्रीलंका में मुरुगन अत्यंत प्रिय हैं। वे धर्म के रक्षक और देवताओं की सेना के सेनापति हैं। राक्षस सुरपद्मन पर उनकी विजय की कथा स्कंद षष्ठी के रूप में मनाई जाती है।

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव