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Kashi-Tamil Sangmam Special: काशी और तमिल का लम्बे समय से जुड़ा है रिश्ता, त्योहार के रूप में मनाया जाता है काशी-तमिल संगमम, जानिए इससे जुड़ा इतिहास...

वाराणसी: भारत की लम्बी विकासवादी यात्रा में तमिल भाषी लोगों की जमीन ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अंग्रेजों द्वारा खुद के हित के लिए सदियों पुराने बुनियादी ढांचे को तोडऩे तक काशी और रामेश्वरम के बीच हर साल कई हजार लोगों ने यात्राएं की थी। तंजावुर के अंतिम शासक सरफोजी महाराज ने 20 जनवरी, 1801 को ब्रिटिश निवासी बेंजामिन तोरिन को एक पत्र लिखा था, जिसमें काशी और रामेश्वरम के बीच के धर्मशालाओं को ना तोड़ने का अनुरोध किया गया था, जो उनके कब्जे में आ गई थी। इन धर्मशालाओं में कई हजार तीर्थयात्रियों और व्यापारियों को एक दिन में तीन बार मुफ्त भोजन दिया जाता था। काशी पर जब मध्य एशिया और पश्चिमी आक्रांताओं के आक्रमण का खतरा मंडराया तो उसके शासकों ने तमिलगम के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में काशी विश्वनाथ मंदिरों का निर्माण कराया। आज भी तमिलगम के गांवों में काशी-विश्वनाथ मंदिर हैं।

 

17 वीं शताब्दी में, धर्मपुरम आधीनम जिले में स्वामी कुमारगुरुपारा देशिकर, जो महान शिव भक्त संत थे उन्होंने काशी के गंगा के  तट पर केदार घाट पर भगवान केदारेश्वर मंदिर का निर्माण किया। बाद में उनके शिष्यों ने भारत की एक और पवित्र नदी कावेरी के तट पर तंजावुर जिले के कुंभकोणम के पास तिरुपनंदाल में एक काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया।

 

काशी और कांची का अपने अनोखे रेशम उत्पादों - विश्व प्रसिद्ध कांचीवरम और बनारसी साडिय़ों के व्यापार के माध्यम से भी एक लंबा रिश्ता रहा है। इसी वजह से काशी- तमिल संगमम की शुरुआत हुई तमिल भाषा के लिए उनका स्थायी प्रेम और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इसके प्रचार - प्रसार के लिए सुब्रमण्यम भारती पीठ की स्थापना के अलावा आगामी काशी-तमिल संगमम संरक्षक और प्रेरक भी बनें। यह संगमम, नवंबर के मध्य से एक महीने तक चलने वाला त्योहार है जो काशी-तमिलगम के बीच पारंपरिक जुड़ाव 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' के नारे को साकार करता है।