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क्या हैं अखाड़े, क्या है इनका इतिहास और योगदान ?

आमतौर पर अखाड़े का मतलब व्यायामशाला या फिर ऐसे स्थान से होता है जहां  पहलवान  कुश्‍ती लड़ते हैं । लेकिन देश में साधुओं के कुछ पारंपरिक विशेष समूहों को भी अखाड़ा कहा जाता है । कैसे शुरु हुए ये अखाड़े, देश में कितने अखाड़े सक्रिय हैं और क्या हैं इनके नियम-कायदे, आइए जानते हैं ।

 

कैसे शुरु हुई अखाड़ा परंपरा ?

आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़ों का गठन किया था। इन अखाड़ों को बनाने का मकसद हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति की रक्षा करना था। दरअसल उस दौर में वैदिक संस्कृति और यज्ञ परंपरा संकट में थी क्योंकि बौद्ध धर्म तेजी से भारत में फैल रहा था और बौद्ध धर्म में यज्ञ और वैदिक परंपराओं का निषेध था । धर्म की रक्षा के लिए नागा साधुओं की एक सेना के रूप में अखाड़ों को तैयार किया गया । इसमें उन्हें योग, आध्यात्म के साथ ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भी दी गई। वही अखाड़े आज तक बने हुए हैं ।

अखाड़ों की अपनी व्यवस्थाएं होती हैं लेकिन आदि शंकराचार्य ने शैव और उदासीन अखाड़ों के अंदर आने वाले 10 अखाड़ों की व्यवस्था चार शंकराचार्य पीठों के हाथों में रखी है। इन अखाड़ों की कमान शंकराचार्यों के पास होती है। अखाड़ों की व्यवस्था के लिए कमेटी के चुनाव होते हैं, लेकिन अखाड़ा प्रमुख का पद अलग होता है जो अखाड़ों की अगुआई करता है। 10 शैव एवं उदासीन अखाड़ों में आचार्य महामंडलेश्वर पद सबसे बड़ा होता है ।

वहीं, वैष्णव अखाड़ों में अणि महंत पद सबसे बड़ा होता है। इसमें महामंडलेश्वर जैसे पदों के समतुल्य श्रीमहंत पद होता है। इन सभी श्रीमहंतों के आचार्य को अणि महंत कहा जाता है, जो अखाड़े का संचालन करते हैं ।

अखाड़े काम कैसे करते हैं ?

अखाड़ों के नियम-कायदे बड़े ही कड़े होते हैं । कुंभ में शामिल होने वाले सभी अखाड़े अपने अलग-अलग नियमों से संचालित होते हैं। छोटी सी भी चूक के दोषी साधु को अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में 5 से लेकर 108 डुबकी लगाने के लिए भेजा जाता है। डुबकी के बाद वह भीगे कपड़े में ही देवस्थान पर आकर अपनी त्रुटि के लिए क्षमा मांगता है। फिर पुजारी पूजा स्थल पर रखा प्रसाद देकर उसे दोषमुक्त करते हैं । विवाह, हत्या या दुष्कर्म जैसे कार्य करने पर अखाड़े से निष्कासित किए जाने का नियम है । अखाड़ों के अनुशासन को मानने की शपथ नागा बनने की प्रक्रिया के दौरान दिलाई जाती है।

कैसे होते हैं अखाड़ों में चुनाव ?

अखाड़े के साधु-संतों के मुताबिक अखाड़े लोकतांत्रिक तरीके से ही चलते हैं। जूना अखाड़े में छह साल में चुनाव होते हैं ताकि सभी को नेतृत्व का अवसर मिले और सभी के भीतर अच्छी नेतृत्व क्षमता आए। कुछ अखाड़ों में बाकायदा एक चुनाव प्रक्रिया का पालन होता है और जरूरत पड़ने पर मतदान भी होता है। अच्छा काम करने वाले को दोबारा चुना जाता है । कुछ अखाड़े ऐसे भी हैं जहां चुनाव नहीं होता है।

अब जानते हैं कि देश के अलग-अलग भागों से संचालित 13 अखाड़े हैं कौन-कौन से ?

शैव सन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े -

1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग, (उत्तर प्रदेश)

2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी, (उत्तर प्रदेश)

3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग, (उत्तर प्रदेश)

4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती- त्र्यंबकेश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)

5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशाश्वमेघ घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)

बैरागी वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े -

8.  श्री दिगम्बर आनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा (गुजरात)

9.  श्री निर्वाणी आनी अखाड़ा- हनुमान गढ़ी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

10. श्री पंच निर्मोही आनी अखाड़ा- धीर समीर मंदिर, बंसीवट, मथुरा (उत्तर प्रदेश)

उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े -

11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)

13. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)

उपरोक्त 13 अखाड़ों के अंतर्गत कई उप-अखाड़े माने गए हैं । हाल ही में किन्नर अखाड़े को जूना अखाड़े में शामिल किया गया है। विभिन्न धार्मिक समागमों और विशेषकर कुंभ मेलों के अवसर पर साधु समूहों के जुलूस और स्नान में सुचारु व्यवस्था बनाए रखने के लिए अखाड़ा परिषद की भी स्थापना की गई है, जो सरकार से मान्यता प्राप्त है। कुंभ में अखाड़ों की शाही सवारी, हाथी-घोड़े की सजावट, घंटा-नाद, नागा-अखाड़ों के करतब चर्चा का विषय बनते रहते हैं । इन अखाड़ों ने देश के स्वतंत्रता संघर्ष में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।