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देवी दुर्गा के साथ हनुमान जी और भैरव बाबा की पूजा क्यों ?

माँ भगवती के साथ हमेशा कोई ना कोई देवता सदैव उपस्थित रहते हैं लेकिन हनुमान जी महाराज और बाबा भैरवनाथ माता के साथ विशेष रूप विराजमान रहते हैं। यह अकारण ही नहीं है बल्कि इससे जुड़े पौराणिक संदर्भ हैं । दरअसल, महादेव की अर्धांगनी माता पार्वती हैं और भोलेनाथ के ही रूद्रावतार के रूप में हनुमान जी का अवतरण त्रेतायुग में हुआ। इस नाते हनुमान जी माँ भगवती के पुत्र के रूप में सदा उनके साथ रहते हैं। वहीं लक्ष्मी स्वरूपा माता सीता जब प्रभु राम के साथ वनवास में थीं तो रावण द्वारा उनके हरण के बाद हनुमान जी ने ही लंका में उनके होने का पता लगाया था और माता सीता से अजर-अमर होने का वरदान प्राप्त किया ।

 

इसी प्रकार जब माँ भगवती ने देवी त्रिकुटा के रूप में अवतार लिया तब एक ओर प्रभु श्रीराम लंका विजय के बाद आयोध्या लोट रहे थे तो वहीं देवी त्रिकुटा प्रभु राम की स्तुति कर रही थीं। श्रीराम ने देवी त्रिकुटा को दर्शन देकर वैष्णो धर्म की महिमा को बढ़ाने के लिए हनुमान जी को माता की सेवा में रहने की आज्ञा दी। माता ने हनुमान जी को अपना प्रमुख गण बना लिया और इस प्रकार वैष्णो देवी के साथ हनुमान जी सदा-सदा के लिए लांगुरिया रूप में पूजे जाने लगे।

 

एक अन्य पौराणिक संदर्भ के अनुसार, एक समय गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने सभी तांत्रिक सिद्धियों का नियंत्रण अपने शिष्य गोरखनाथ को भेंट स्वरुप दे दिया था। उन्हीं गोरखनाथ के परम शिष्यों में से एक थे भैरवनाथ, जिन्होंने परम शक्ति का रहस्य जानने के लिए तांत्रिक विद्याएं अपने गुरु गोरखनाथ से सिद्धि के बल से प्राप्त कर ली थीं। इन्हीं शक्तियों के अहंकारवश वो शक्ति स्वरूपा वैष्णो देवी को सताने के लिए निकल पड़े । जब भी माँ चलतीं तो पीछे-पीछे भैरव भी हो लेते । देवी ने उन्हें बहुत समझाया पर भैरव नाथ नहीं माने । यहां तक कि देवी से युद्ध करने पर आमादा हो गए ।  

 

माँ ने भैरवनाथ का मस्तक धड़ से अलग कर दिया और अपना विशाल स्वरूप दिखया। भैरव को अपनी गलती का अहसास हुआ । अंत समय में भैरव ने देवी को माँ कहकर पुकारा और क्षमा याचना की । ममतामयी माँ ने उन्हें क्षमा करते हुए वरदान दिया कि ‘अब से तुम सदैव मेरे साथ ही रहोगे और क्षेत्र की रक्षा करने के कारण ही क्षेत्रपाल भैरव के रूप में पूजे जाओगे।

 

दुर्गासप्तशती के बारहवें अध्याय में माँ भगवती ने स्वयं कहा है ...

 

मैं ही ऋद्धि-सिद्धि महाकाली विकराल, मैं ही भगवती चण्डिका शक्ति शिवा विशाल

भैरों हनुमत मुख्य गण हैं मेरे बलवान, दुर्गा पाठी पर सदा करते कृपा महान

 

इस प्रकार हनुमान जी माँ भगवती के आगे चलते हैं और भैरवनाथ पीछे। जब माँ भगवती देवी-देवताओं के साथ दरबार में विराजमान होती हैं तब बजरंगबली पहरा देते हैं तो वहीं बाबा भैरव चंवर डुलाते हैं । इसीलिए, हनुमान जी और भैरव बाबा की पूजा के बिना देवी माँ की पूजा भी अधूरी मानी जाती है। नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन के समय भी नौ कन्याओं का पूजन नौ देवी मानकर किया जाता है जिनके साथ दो लौकड़े वीर भी बिठाए जाते हैं । एक लांगुर स्वरूप हनुमान जी तो दूसरे भैरव रूप । इस प्रकार 11 का अंक पूर्ण होता है जो अत्यंत शुभ माना जाता है । यही संपूर्ण नवरात्रि व्रत का फल भी देता है। इसी तरह मान्यता है कि भैरव नाथ मंदिर में दर्शन बिना वैष्णो देवी की यात्रा भी अधूरी मानी जाती है ।

 

:- रमन शर्मा