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जानिए, राजस्थान के त्रिनेत्र गणपति की महिमा

राजस्थान की राजधानी जयपुर से 150 किलोमीटर दूर सवाई माधोपुर के रणथंभौर किले के अंदर एक प्रसिद्ध गणेश मंदिर है। यहां के विनायक जी को भारत का प्रथम गणेश कहते हैं, जिनकी तीन आँखें हैं। यह देश का पहला ऐसा मंदिर है, जिसमें भगवान अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि-सिद्धि और पुत्रों शुभ-लाभ के साथ विराजमान हैं। त्रिनेत्र गणेश मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां आने वाले पत्र हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। इसलिए हर मंगल काम से पहले भक्त त्रिणेत्र गणेश को निमंत्रण पत्र भेजते हैं। वहीं लोग अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए भगवान को अर्जी भी लगाते हैं। और ये अर्जियां, पोस्टमैन, चिट्ठियों के माध्यम से मंदिर में लेकर पहुंचता है। डाक भेजने का पता है, 'श्री गणेश जी, रणथंभौर का किला, जिला-सवाई माधोपुर, राजस्थान। और मंदिर के पुजारी सभी चिट्ठियों को भगवान गणेश के चरणों में रखते हैं। दुनिया भर से लोग यहां पर भगवान गणेश की पूजा करने के लिए आते हैं।

 

इस प्रसिद्ध मंदिर में हर दिन मुख्य रूप से पांच आरतियां होती हैं। जिनमें सुबह की आरती, फिर श्रृंगार आरती, भोग आरती, सूर्यास्त के दौरान संध्या आरती और आखिर में शयन आरती होती है। एक मान्यता के अनुसार जब द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मिणी जी से हुआ था तब भगवान कृष्ण गलती से गणेश जी को बुलाना भूल गए जिससे भगवान गणेश नाराज हो गए और उनके आदेश पर मूषकों की विशाल सेना ने श्रीकृष्ण के रथ के चारों ओर की धरती को खोद डाला। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का रथ धरती में धँस गया और आगे नहीं बढ़ पाया। मूषकों के बताने पर भगवान श्रीकृष्ण को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे रणथम्भौर स्थित भगवान गणेश को लेने वापस आए और तब कहीं जाकर श्रीकृष्ण का विवाह सम्पन्न हुआ। तब से भगवान गणेश को विवाह व मांगलिक कार्यों में प्रथम आमंत्रित किया जाता है। और यही कारण है कि रणथम्भौर गणेश को भारत का प्रथम गणेश कहते हैं।

 

एक अन्य मान्यता के अनुसार, राजा हम्मीर देव और अलाउद्दीन खिलजी के बीच रणथंभौर में जब युद्ध हुआ था तो उस समय अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने रणथंभौर किले को चारों ओर से घेर लिया था। ऐसे में एक रात राजा हम्मीर देव के सपने में भगवान गणेश ने आकर उन्हें दर्शन दिए और ठीक उसके अगले ही दिन किले में त्रिनेत्र गणेश की मूर्ति स्वयं प्रकट हो गई। कहते हैं कि भगवान के आशीर्वाद से कई सालों से चला आ रहा युद्ध समाप्त हो गया और उसके बाद राजा हम्मीर देव ने उसी जगह भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।