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ईश्वर की स्वीकृति क्यों आवश्यक ?

विश्व के सबसे धनी सेठ के यहाँ असंख्य लोगों की पंक्ति लगती है। बताते हैं कि उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं। शायद ही कोई होगा जो इस धनी सेठ का नाम ना जानता हो। भाँति भाँति परेशानियां लेकर लोग उसके पास आते हैं और वो उनका निवारण करता है। किंतु एक दिन वो कुछ घोर चिंतन में था। वो सोच रहा था कि 'मैं इतना धनी सेठ, पूरी दुनिया मेरी मुट्ठी में समाती है, आज तक कोई ऐसी इच्छा मेरे समक्ष नहीं आई जिसको मैं पूरा ना कर सकता होऊँ। आश्चर्य मुझे इस बात का है कि लोग मुझसे बहुत क्षुद्र और क्षणिक चीज़ें माँगते हैं।" सत्य यही है, हमें ईश्वर से माँगना नहीं आता। 

 

सोचने वाली बात है, जो ऊर्जा इस समस्त ब्रह्मांड को संचालित करती हो, उससे हम इतनी छोटी और पल भर की चीज़ें आख़िर क्यों माँगते हैं? उनके लिए तो हमारा पुरुषार्थ ही बहुत होना चाहिए। बात नौकरी की हो, किसी एग्ज़ाम की हो, शादी की हो या फिर वो सभी विषय जो जीवन से जुड़े हैं। ऐसी इच्छाओं को मांगने की कोई मनाही नहीं, किंतु आप अपना अर्जित किया हुआ पुण्य व्यर्थ में गँवा रहे हैं। जो किसी विपत्ति में या किसी दिन आशीर्वाद स्वरूप आपको प्राप्त होता। 

 

गुरुदेव आर्यम का यह उद्धरण स्टीक कहता है, भला स्वीकृति से बड़ी माँग क्या हो सकती है? जब आप यह कहते हैं कि 'हे ईश्वर, आप मुझे स्वीकार करें' तो आप अपनी समग्रता की स्वीकृति माँग रहे हैं। और जब वो स्वीकार कर लें तो उन्हें आपकी प्रार्थनाएँ, विचार, व्यवहार, निर्णय, आहार, आहुति, भोग, आपके साथी…अर्थात् आप और आपका जीवन उन्हें स्वीकार है ! इससे अधिक कुछ नहीं माँग सकते आप। 

 

सत्य तो यह है, कि जब आप उसको देने का विचार रखते हों और देते हों, जो सबको देता है, तब आप अपने उच्चतम आयाम पर होते हैं। यही तो सनातन सिखाता है, यही तो अग्निहोत्र-हवन बतलाते हैं, जब हर आहुति पर, हर अर्पण पर आत्मा से स्वाहा निकले तो फिर जीवन पर्यन्त आपको कभी भी, किसी से भी, कुछ भी माँगना नहीं पड़ेगा। चूँकि जिसको ईश्वर स्वीकार कर लेता है, वो उसे अपने जैसा बना लेता है। 

 

;- जगद्गुरु प्रोफेसर पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी महाराज